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Wednesday, January 14, 2026

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ईवीएम विवाद से साइबर ठगी तक, संसद में गरमाई बहस

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने मंगलवार को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा ईवीएम को लेकर उठाए गए सवालों पर कड़ा पलटवार किया। चुनाव सुधारों पर चर्चा के दौरान उन्होंने कहा कि देश में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें किसी और ने नहीं बल्कि राहुल गांधी के पिता और पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने ही 1987 में एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में पेश की थीं। दुबे ने सवाल उठाया कि फिर आज कांग्रेस और राहुल गांधी किस आधार पर ईवीएम और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर संदेह जता रहे हैं।

निशिकांत दुबे ने कहा कि राहुल गांधी यह आरोप कैसे लगा सकते हैं कि चुनाव आयोग सत्ता में बैठे लोगों के साथ मिलकर चुनाव को प्रभावित कर रहा है, जबकि इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने हमेशा चुनावी और संवैधानिक संस्थाओं में अहम भूमिका निभाने वाले लोगों को बड़े पदों से सम्मानित किया। उन्होंने बताया कि 1991 में नरसिम्हा राव सरकार के दौरान देश में व्यापक रूप से ईवीएम का इस्तेमाल शुरू हुआ।

भाजपा सांसद ने यह भी याद दिलाया कि 1961 और 1971 में बनी चयन समितियों ने अपनी रिपोर्ट में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की सिफारिश की थी और यहां तक कहा था कि चुनाव में धांधली रोकने के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि आज ईवीएम पर सवाल उठाना राजनीतिक हार की कुंठा को दर्शाता है।

इससे पहले राहुल गांधी ने लोकसभा में भाजपा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि पार्टी चुनाव आयोग के साथ मिलकर वोट चोरी कर रही है, जिसे उन्होंने देश के लिए सबसे बड़ा राष्ट्र-विरोधी कृत्य करार दिया। उन्होंने तीन सवालों के जरिए दावा किया था कि भाजपा चुनाव आयोग का इस्तेमाल कर भारतीय लोकतंत्र को कमजोर कर रही है।

राहुल गांधी के आरोपों का जवाब देते हुए निशिकांत दुबे ने कांग्रेस पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस शासनकाल में बतुक सिंह दस साल तक यूपीएससी चेयरमैन रहे, देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन को सूडान का गवर्नर बनाया गया, वीएस रामादेवी हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल रहीं, टीएन शेषन को अहमदाबाद से भाजपा के खिलाफ कांग्रेस उम्मीदवार बनाया गया और एमएस गिल सेवानिवृत्ति के बाद दस साल तक केंद्रीय मंत्री रहे। दुबे ने कहा कि ऐसे में कांग्रेस को पारदर्शिता पर सवाल उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

इस बीच सरकार ने संसद को बताया कि भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (आई4सी) ने साइबर धोखाधड़ी के खिलाफ बड़ी सफलता हासिल की है। गृह राज्य मंत्री बंदी संजय कुमार ने लिखित जवाब में बताया कि 2024 में शुरू किए गए आई4सी ने अब तक बैंकों और वित्तीय संस्थानों की मदद से 8031.56 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन को रोका है। इसके साथ ही 18.43 लाख संदिग्धों की पहचान और 24.67 लाख म्यूल अकाउंट्स का पता लगाया गया है, जिनका इस्तेमाल साइबर अपराधी ठगी की रकम ट्रांसफर करने के लिए करते हैं।

कुमार ने यह भी बताया कि प्रतिबिंब पोर्टल के जरिए 16,840 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। यह पोर्टल पुलिस और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को साइबर अपराधियों को ट्रैक करने और उनके नेटवर्क को तोड़ने में अहम भूमिका निभा रहा है।

वहीं, केंद्र सरकार ने बिना दावे वाली वित्तीय संपत्तियों को उनके असली हकदारों तक पहुंचाने के लिए शुरू की गई ‘आपका पैसा-आपका अधिकार’ योजना की जानकारी भी दी। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में बताया कि अक्तूबर और नवंबर के दौरान करीब दो हजार करोड़ रुपये की बिना दावे वाली संपत्तियां उनके वास्तविक मालिकों को लौटाई गईं। इसके लिए 4 अक्तूबर से 5 दिसंबर तक देश के 477 जिलों में विशेष शिविर लगाए गए, जिनमें जनप्रतिनिधियों, जिला प्रशासन और वित्तीय संस्थानों के अधिकारियों ने भाग लिया।

इसी संदर्भ में संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने विपक्ष पर चुनाव प्रक्रिया को लेकर गलत प्रचार फैलाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि लोकसभा में होने वाली चर्चा के दौरान सरकार विपक्ष द्वारा फैलाए गए भ्रम और गलतफहमियों को दूर करेगी। रिजिजू ने यह भी कहा कि चुनाव प्रणाली को लेकर जनता के भरोसे और भागीदारी को कमजोर करने की कोशिशें ठीक नहीं हैं और सरकार तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करेगी।

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