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Monday, January 26, 2026

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न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश, जिला जज की बर्खास्तगी रद्द

न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निचली अदालतों के न्यायाधीशों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और कड़ा संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा है कि केवल किसी आदेश के गलत होने या निर्णय में चूक के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी को न तो विभागीय कार्रवाई का सामना करना चाहिए और न ही आपराधिक मुकदमे की पीड़ा झेलनी चाहिए। अदालत ने कहा कि निडर और स्वतंत्र न्यायाधीश ही स्वतंत्र न्यायपालिका की असली नींव होते हैं।

यह मामला मध्य प्रदेश के जिला न्यायाधीश निर्भय सिंह सुलिया से जुड़ा है, जिन्हें आबकारी अधिनियम से जुड़े मामलों में जमानत देते समय अलग-अलग मानक अपनाने के आरोप में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। राज्य सरकार ने यह कार्रवाई हाईकोर्ट की सिफारिश पर की थी। विभागीय जांच में जमानत आदेशों को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप सही माने गए थे। इसके खिलाफ सुलिया ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।

जस्टिस जे.बी. परदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि न्यायिक अधिकारी का काम फैसले देना होता है और हर फैसले में एक पक्ष असंतुष्ट रहता ही है। ऐसे में असंतुष्ट लोग बदले की भावना से झूठे आरोप लगा सकते हैं। अदालत ने साफ कहा कि डर के माहौल में काम करने वाला न्यायाधीश न्याय नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि निर्भय सिंह सुलिया ने 27 वर्षों की बेदाग सेवा दी थी। केवल चार जमानत आदेशों के आधार पर उन्हें भ्रष्ट ठहराना और नौकरी से निकाल देना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट की वास्तविकताओं का जिक्र करते हुए कहा कि वहां काम का भारी दबाव होता है, रोज बड़ी संख्या में मामले सूचीबद्ध रहते हैं, इसके बावजूद अधिकांश न्यायिक अधिकारी पूरी ईमानदारी और निष्ठा से अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हैं।

अदालत ने जांच रिपोर्ट को भी गंभीर रूप से दोषपूर्ण बताया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न तो शिकायतकर्ता से पूछताछ की गई और न ही उस स्टेनोग्राफर को जांच में शामिल किया गया, जिस पर भ्रष्टाचार में संलिप्त होने का आरोप था। पीठ ने टिप्पणी की कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर कोई भी समझदार व्यक्ति उस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकता था, जिस पर जांच अधिकारी पहुंचा।

शीर्ष अदालत ने 2 सितंबर 2015 की बर्खास्तगी के आदेश, अपीलीय आदेश और हाईकोर्ट के फैसले—तीनों को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि निर्भय सिंह सुलिया को सेवानिवृत्ति की आयु तक सेवा में माना जाएगा। साथ ही, उन्हें पूरी बकाया तनख्वाह और सभी सेवानिवृत्तिक लाभ छह प्रतिशत ब्याज के साथ आठ सप्ताह के भीतर दिए जाएं।

अदालत ने झूठी और गुमनाम शिकायतों पर भी सख्त चेतावनी दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश के कई हिस्सों में कुछ शरारती तत्व और बार के कुछ सदस्य न्यायाधीशों को डराने के लिए झूठी शिकायतें करते हैं। ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, जिसमें अवमानना की कार्यवाही भी शामिल हो सकती है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ बिना किसी नरमी के विभागीय या आपराधिक कार्रवाई की जानी चाहिए। संतुलन और सावधानी दोनों जरूरी हैं।

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