सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई सेवानिवृत्त जजों ने मंगलवार को एक संयुक्त बयान जारी कर भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ चल रही तथाकथित मोटीवेटेड कैंपेन पर कड़ी आपत्ति जताई है। यह बयान उस विवाद के बीच सामने आया है, जो रोहिंग्या प्रवासियों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई द्वारा की गई टिप्पणियों को लेकर खड़ा किया गया। रिटायर्ड जजों ने स्पष्ट कहा कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को जानबूझकर संदर्भ से हटाकर पेश किया जा रहा है, ताकि न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके।
संयुक्त बयान में कहा गया कि 5 दिसंबर को कुछ पूर्व जजों, वकीलों और ‘कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स’ (CJAR) की ओर से जारी खुले पत्र में सुप्रीम कोर्ट की 2 दिसंबर की सुनवाई से जुड़ी टिप्पणियों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। उस पत्र में आरोप लगाया गया था कि रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर अदालत ने अमानवीय टिप्पणी की है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है।
रिटायर्ड जजों ने कहा कि सीजेआई सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान केवल एक बुनियादी कानूनी सवाल पूछा था कि कानून के तहत रोहिंग्या प्रवासियों को यह दर्जा किसने दिया है। इसे एक साधारण विधिक प्रश्न बताते हुए उन्होंने कहा कि इस सवाल को जानबूझकर गलत अर्थों में पेश करना दुर्भावनापूर्ण है। बयान में यह भी स्पष्ट किया गया कि अदालत ने बेहद साफ शब्दों में कहा था कि भारत की धरती पर मौजूद कोई भी व्यक्ति, चाहे वह नागरिक हो या विदेशी, उसे यातना, जबरन गायब किए जाने या अमानवीय व्यवहार का सामना नहीं करना चाहिए और हर व्यक्ति की गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए।
जजों ने कहा कि इन अहम टिप्पणियों को छिपाकर कोर्ट पर अमानवीय होने का आरोप लगाना तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने के समान है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर राष्ट्रीयता, दस्तावेजों, सीमा सुरक्षा या प्रवासन नीति से जुड़े हर सवाल को ‘नफरत’ या ‘पूर्वाग्रह’ करार देकर बदनाम किया जाएगा, तो इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
संयुक्त बयान में रिटायर्ड जजों ने सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस सूर्यकांत पर पूरा भरोसा जताया और अदालत की टिप्पणियों को गलत तरीके से पेश करने की कड़ी निंदा की। उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी नागरिकों द्वारा भारतीय पहचान और कल्याणकारी दस्तावेजों की कथित अवैध प्राप्ति की जांच के लिए कोर्ट-निगरानी में एसआईटी गठित करने के सुझाव का वे समर्थन करते हैं।
अंत में बयान में कहा गया कि भारत का संवैधानिक ढांचा मानवता और सतर्कता दोनों की अपेक्षा करता है। न्यायपालिका ने राष्ट्रीय अखंडता और मानव गरिमा के बीच संतुलन बनाते हुए अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन किया है। ऐसे प्रयासों को समर्थन मिलना चाहिए, न कि जानबूझकर बदनाम करने की कोशिश।

