सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर महिला वकीलों के यौन उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को नोटिस जारी किया है। मामला बॉम्बे हाई कोर्ट के उस विवादित फैसले से जुड़ा है, जिसमें कहा गया था कि यौन उत्पीड़न से संरक्षण (PoSH) कानून बार काउंसिल में वकीलों द्वारा वकीलों के खिलाफ की गई शिकायतों पर लागू नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब पूरे मुद्दे पर व्यापक कानूनी समीक्षा का रास्ता खुल गया है।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और आर. महादेवन की बेंच ने यह नोटिस सुप्रीम कोर्ट वुमेन लॉयर्स एसोसिएशन की अपील पर जारी किया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि हाई कोर्ट के फैसले ने महिला वकीलों को PoSH एक्ट के तहत कानूनी संरक्षण और उपायों से वंचित कर दिया है, जिससे वे कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायतों को लेकर ‘रेमेडीलेस’ यानी बिना किसी ठोस उपाय के रह जाती हैं।
याचिका में कहा गया कि हाई कोर्ट ने सात जुलाई के आदेश में माना कि 2013 का PoSH एक्ट बार काउंसिल पर लागू नहीं होता। हाई कोर्ट का तर्क था कि महिला वकील वकीलों के खिलाफ शिकायत एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35 के तहत दर्ज करा सकती हैं। लेकिन याचिकाकर्ताओं ने कहा कि धारा 35 केवल ‘प्रोफेशनल मिसकंडक्ट’ से संबंधित है, यौन उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मामलों से नहीं।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि बार काउंसिल एक कार्यस्थल है—जहां महिला वकील पेशेवर रूप से कार्य करती हैं। ऐसे में PoSH कानून के लागू न होने से उनकी सुरक्षा और सम्मान दोनों प्रभावित होते हैं। उन्होंने कहा कि धारा 35 के तहत शिकायतों पर कार्रवाई लंबी और जटिल होती है, जो यौन उत्पीड़न मामलों की प्रकृति से मेल नहीं खाती। इसलिए PoSH एक्ट ही लागू होना चाहिए।
अरावली संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, नई खनन लीज़ पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर भी एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित अरावली की एक समान वैज्ञानिक परिभाषा को मंजूरी दे दी। इसके तहत 100 मीटर या उससे अधिक स्थानीय ऊंचाई वाले भू-आकार को अरावली पर्वत माना जाएगा और 500 मीटर के दायरे में स्थित ऐसे दो या अधिक पहाड़ियों के समूह को अरावली पर्वतमाला का हिस्सा माना जाएगा।
इसके साथ ही अदालत ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में नई खनन लीज़ देने पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी है—जब तक संबंधित विशेषज्ञ संस्थाओं की रिपोर्ट प्राप्त नहीं हो जाती। अदालत ने कहा कि अरावली के कोर और ‘इनवॉयलेट’ क्षेत्रों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। 29 पन्नों के फैसले में कहा गया कि सतत खनन प्रबंधन योजना तैयार होने के बाद ही भविष्य में सीमित खनन की अनुमति दी जा सकेगी। फिलहाल पहले से चल रही खदानें समिति की सिफारिशों का पालन करते हुए काम कर सकेंगी।
अदालत ने अरावली को थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने वाला ‘ग्रीन बैरियर’ बताते हुए कहा कि इसकी वैज्ञानिक परिभाषा जैव-विविधता संरक्षण और अवैध खनन रोकने के लिए अनिवार्य है।

