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Sunday, May 22, 2022

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प्रधान अध्यापिका के तानाशाह रवैये के आगे मुख्यमंत्री व संबन्धित मंत्रालय तथा महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय भी पंगु !पंकजा मुंडे के कार्यालय ने महिला व बाल सुरक्षा से पल्ला झाड़ा कहा ये हमारे मंत्रालय से संबन्धित नही !

ठाणे समाज कल्याण विभाग की निस्क्रियता के चलते एक कर्ण बधिर विद्यार्थी 19 मई 2016 से शिक्षा से वंचित!मुख्यमंत्री भी मौन, और संबंधित मंत्रालय भी कन्नी काटते नजर आ रहे हैं ?

जबकि सरकार में शामिल शिवसेना के दो क्षेत्रीय नगर सेवकों (पार्षद) ने भी विद्यालय पर कर्यवाही करने के लिये ठाणे समाज कल्याण विभाग को पत्र लिखा,

ठाणे समाज कल्याण विभाग क्यों कर विद्यालय पर सख्त कार्यवाही करने से कतरा रहा है, ऐसा क्या है उस तानाशाह प्रधानाध्यापिका के रसूक का रहस्य, जिसकी वजह से संबन्धित विभाग या मंत्रालय अपने आपको पंगु महशूस कर रहे हैं? या फिर अभिव्यक्ति की आजादी पर कुाराघात?

इस प्रकार तो कई सवाल उत्पन्न होते हैं। जिस विद्यालय को सरकार द्वारा अनुदान प्रदान किया जाता हो, तो उस विद्यालय द्वारा गरीब असहाय विकलांग छात्रों से, जबरन फीस वसूलना कहाँ तक जायज, दाताओं द्वारा दिये जाने वाले श्रवण यंत्र व अन्य वस्तुओं में भी हो रहा है गोलमाल, फिर भी विभाग उस पर कार्यवाही करने को तैयार नहीं, बच्चों को मिडे मील के नाम पर सिर्फ उबली हुई दाल और चावल ही परोसा जाता है।क्योंकर संबधित विभाग मौन? क्या सहभागिता से चल रहा है ये कारोबार ? यदि नहीं तो क्या उपरोक्त विषयों पर की जा रही है नजरंदाजी? क्या सरकार द्वारा करायी जायेगी जाँच ?

क्या ये उन अभिभावकों (2014 से अब तक विद्यालय से जिन छात्रों के नाम कटे या छोड़ कर चले गये)से पता लगया जायेगा कि किन कारणों से उनके बच्चों का नाम कटा या विद्यालय छोड़ा।या फिर उस वक्त का है इन्तजार जब तक कोई अप्रिय घटना घटित नहीं होती या फिर प्रद्युम्न या निर्भया जैसी घटना घटित होने के बाद सरकार नींद से जागेगी?

क्योंकि विद्यालय की तानाशाह महोदया द्वारा महिला सुरक्षा पर एक महिला होते हुये भी ऐसी अभद्र टिप्पणी की गई है कि यदि माहिला खुद चाहेगी तो ही गलत होगा ये उस पर निर्भर है !जिस पर महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय का कहना है कि ये उसके विभाग से संबंधित नहीं है।

या फिर पिता का एक पत्रकार होना अभिषाप? क्या ये सत्यापित नहीं करता है कि सरकार पत्रकार विरोधी नीति पर चल रही है। ताकि गरीबों और असहायों की आवाज उठाने वालों को दबाया जा सके, क्योंकि पूर्व में रवि निगम द्वारा कल्याण – ठाणे (मुम्बई) में बिल्डरों द्वारा किये घोटालों पर सरकार व प्रशासन को घेरा था जिस पर प्रशासन को मजबूरन कार्यवाही कर कुछ बिल्डरों को जेल भेजना पड़ाथा।क्या सरकार की ऐसी ही मंसा है कि रवि निगम के बढ़ते कदम या साहस को कमजोर करना ?क्योंकि रवि निगम ने अपने समाचार पत्र “मानवाधिकार अभिव्यक्ति” व NGO ( श्रमिक उत्थान एंव सामाजिक कल्याणकारी असो.) तथा सोशल मीडिया तीनों ही माध्यमों से सरकार व प्रशासन पर दबाव बनाया था जिस पर क्षेत्रीय समाचार पत्र भी लिखने को तैयार नहीं थे।

तो क्या इसकी सजा रवि निगम के बेटे को भुगतनी पड़ रही है ? या कसर निकाली जा रही है ? क्या ऐसे गंभीर विषय पर मीडिया हाऊस या पत्रकार बन्धुओं को रवि निगम का साथ नहीं देना चाहिये ?
– MANVADHIKAR ABHIVYAKTI.
Next. …..ऐसा प्रतीत होता

Continuing…..
ऐसा प्रतीत होता है कि विद्यालय की प्रधानाध्यापिका ने पिता द्वारा गरीब असहाय विकलांग छात्रों की मदद हेतु की कार्यवाही से क्षुब्ध होकर मूक बधिर बेटे की स्कूल बस रोक निकाली भड़ास …???

ज्ञात हो कि विगत दो वर्ष पूर्व विद्यालय के कुछ गरीब असहाय विकलांग छात्रों के अभिभावकों द्वारा किन्ही कारणोंवश स्कूल की फीस नहीं जमा की गई, तो प्रधानाध्यापिका द्वारा नाम काटने की धमकी दी जाने लगी, जब इस बत की खबर विद्यालय के ही शिक्षकों द्वारा छात्र रूद्र निगम के पिता समाज सेवक / पत्रकार रवि निगम को प्राप्त हुई और शिक्षकों द्वारा उन छात्रों की मदद हेतु आग्रह किया गया तो रवि निगम ने मदद का अश्वासन दिया कि यदि विद्यालय द्वारा अपने लेटर हेड पर छात्रों की मदद हेतु लिख कर आग्रह किया जाये तो उनकी सहायता अवश्य हो सकती है, क्योंकि यदि इस विषय में किसी भी दाता से मदद मांगी जायेगी तो वो उसका साक्ष अवश्य मांगेगा। लेकिन जब रवि निगम ने इस विषय पर प्रधानाध्यापिका से बात की तो वो लिख कर देने को तैयार थीं, लेकिन प्लेन पेपर पर।

जिसकी वजह से उन छात्रों की मदद कर पाने में दिक्कत आ रही थी, उधर छात्रों के एक दो अभिभावकों को शिक्षकों द्वारा रवि निगम का कॉन्टेक्ट नम्बर मिल गया, जिन्होने स्वतः रवि निगम को बताया कि यदि फीस नहीं जमा हो पायेगी तो उनके बच्चों के नाम प्रधानाध्यापिका काट देगीं, क्योंकि ऐसा वो पूर्व में कर चुकी हैं, अभिभावकों की ऐसी दशा देख किसी को भी अच्छा नहीं लगेगा, जिस पर रवि निगम ने RTl के माध्यम से कुछ सवालों के जवाब मांगे तो, महोदया इस बात पर बिफर पड़ी, और आनन – फानन में अपने कुछ हितैषी या कह लीजिये भय व्याप्त अभिभावकों की मिटिंग बुला डाली, जिसमें विद्यालय को संचालित करने वाली संस्था भारतीय स्री जीवन विकास परिषद के पदाधिकारी भी मौजूद थीं।जिन्होंने उन विषयों पर सफाई भी दी, और भरोसा दिलाया कि भविष्य में इसकी पुनरः वृत्ति नहीं होगी, साथ ही शेष कमियों पर भी गौर किया जायेगा।

लेकिन रवि निगम पर उस पत्र को लेकर दबाव बनाने की कोशिस की गई कि वो अपने पत्र को वापस ले लें, जिस पर उन्हे ये भी चेताया गया था कि इस पत्र की वजह से संबन्धों र्में खटास आ सकती है। लेकिन रवि निगम ने उनके प्रस्तव को अस्वीकार करते हुये, लिखित जबाव उन्हे प्रदान की जाये इस बात पर वो तटस्थ बने रहे, और हाँ वो अब इस विषय को तूल नही देंगे और न ही इसकी प्रतिलिपि अन्य किसी को प्रेषित करेंगें ये अश्वासन अवश्य दिया,और अतंतः आपसी सहमति बन गई।

लेकिन अन्ततोगत्वा तानाशाह प्रधानाध्यापिका महोदया ने स्कूल बस रोक अपनी भड़ास निकाल ही डाली, इसकी एक और भी वजह ये भी रही होगी कि यदि जल्द ही इनसे मुक्ति नहीं पायी गई तो ये विद्यालय के कार्यों में दखल देते रहेंगें, और ये उनके कार्यकलापों पर बार-बार हस्ताक्षेप करते रहेंगे, अत: ऐसा रास्ता चुना गया कि सांप भी मर जाये.और लाठी भी न टूटे।
क्या ऐसे गंभीर विषय पर मीडिया हाऊस या पत्रकार बन्धुओं को रवि निगम का साथ नहीं देना चाहिये ?

-मानवाधिकार अभिव्यक्ति.

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