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गडकरी के मंत्रालय में उनके निजी सचिव का घपला, कंपनी बनाकर सरकार से ली फंडिंग! —— राकेश साहू

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केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की एक बार फिर से मुसीबत बढ़ी है। इस बार वे अपनी कंपनियों की वजह से नहीं निजी सचिव की कारस्तानी के कारण चर्चा में हैं। मामला प्राइवेट कंपनी बनाकर सरकारी लाभ अर्जित करने का है। खुद को फंसता देख निजी सचिव कंपनी का डायरेक्टर पद छोड़कर भाग खड़े हुए हैं। हालांकि अभी पूरी तफ्तीश होनी बाकि है कि उन्होंने एनर्जी से जुड़ी फर्म बनाकर केंद्रीय मंत्रालयों से कितनी धनराशि जुटाई।  इसकी जांच की मांग उठ रही है।

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कौन हैं निजी सचिव

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नाम है वैभव डांगे।  गडकरी के पुराने वफादार माने जाते हैं। पांच साल से उनसे जुड़े हैं। मोदी सरकार बनने के बाद जब गडकरी मंत्री बने तो उन्होंने वैभव को अपना निजी सचिव बनाया। रोड, ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर गडकरी के प्राइवेट सेक्रेटरी पद र  वैभव की नियुक्ति आठ अगस्त 2014 को हुई।  कैबिनेट की अप्वाइमेंट्स कमेटी की मंजूरी के बाद उनकी नियुक्ति की बकायदा अधिसूचना जारी हुई है। इस प्रकार उन पर सेंट्रल सिविल सर्वेंट एक्ट के रूल्स लागू होते हैं। मगर वे इन्हीं नियमों के उल्लंघन में फंसते दिख रहे हैं।

सर्विस रूल्स उल्लंघन

वैभव की गिनती गडकरी के पुराने वफादारों में होती है। वे महाराष्ट्र के मोतीराम किशनराव के साथ मिलकर इंडियन फेडरेशन ऑफ ग्रीन एऩर्जी(IFGE) की स्थापना किए। दोनों के पास कंपनी के 50- 50प्रतिशत शेयर हैं। कंपनी का पंजीकरण सेक्शऩ 8  के तहत हुआ। जिसका मतलब होता है कि कंपनी का संचालन प्राफिट के लिए नहीं होता।

चूंकि वैभव मंत्री के निजी सचिव के रूप में केंद्र सरकार के अंग हो गए हैं। इस नाते सेंट्ल सिविल सर्विसेज के को़ड ऑफ कंडक्ट के मुताबिक कंपनी संचालन का मामला नियम 12 का उल्लंघन है। जिसमें कहा गया है कि कोई भी सरकारी मुलाजिम फंड कलेक्शन से जड़े किसी भी संस्थान में योगदान नहीं देगा।

क्या है घपले का मामला

*IFGE कंपनी की 2015-16 की बैलेंसशीट में 1.33 करोड़ ‘corpus grant’ दर्ज है। बैलेंसशीट में विवरण दर्ज है-Treatment of Grant in Aid has been made in the accounts as per AS-12 Accounting for Government Grants.” इससे जाहिर होता है कि कंपनी सरकारी ग्रांट की अर्हता के  लिए अपने एकाउंट को स्टैंडर्ड कर रही है।*

वैभव हालांकि आरोपों को खारिज करते हैं कि गडकरी की मिनिस्ट्री ने उनकी कंपनी को कभी ग्रांट नहीं दी। मगर हकीकत कुछ और मालुम पड़ती है।

वेबसाइट देखकर पता चलता है सचिव वैभव की कंपनी गडकरी के मंत्रालय के साथ मिलकर तमाम विषयों पर कॉंफ्रेंस और सेमिनार आयोजित करती है। गडकरी के अधीन आने वाले सार्वजनिक उपक्रम यानी पीएसयूज भी इन आयोजनों में जुड़ते हैं। इंदौर में अप्रैल 2016 में ग्लोबल बंबू समिट हुआ। जिसका सपोर्ट मिनिस्ट्री ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाइवेज ने किया।

यही नहीं मई 2017 में कंपनी ने एक और कार्यक्रम आयोजित किया। नाम था- ‘Conclave on Green Ports & Oil Spill Management’। यह कार्यक्रम मुंबई के शिपिंग कारपोरेशन ऑफ इंडिया ऑडिटोरियम में आयोजित हुआ था। जिसमें शिपिंग मिनिस्ट्री ने अहम भूमिका निभाई। यही नहीं इंडियन पोर्ट्स एसोसिएशन इस आयोजन का अहम पार्टनर रहा।15 लाख तक आर्थिक सहायता भी इस आयोजन में पार्टनर्स ने की।

सचिव ने कंपनी के पद से दिया इस्तीफा

जब गडकरी के सचिव के खेल का खुलासा हुआ। द हिंदू ने पक्ष जानने के लिए सात नवंबर को हिंतों के टकराव को लेकर कई सवाल भेजे तो नौ दिन बाद 16 नवंबर को उन्होंने दर्शाया कि कंपनी वह डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे चुके हैं।  रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज में दर्ज विवरण के मुताबिक वैभव कंपनी के डायरेक्टर पद से 13 सितंबर 2017 को अलग हो चुके हैं।

क्या कहते हैं वैभव

वैभव का कहना है कि उन्होंने कंपनी तब खड़ी की थी, जब वह सरकार से नहीं जुड़े थे। मंत्रालय से जुड़ने के बाद वे फुलटाइम सरकारी मुलाजिम हैं। 30 नवंबर 2013 को  IFGe की स्वतंत्र संगठन के रूप में स्थापना हुई थी। तब वह प्राइवेट व्यक्ति था। लिहाजा सारे आरोप बेबुनियाद हैं

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