– रवि जी. निगम

नई दिल्ली : दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा एक रेप के मामले की सुनवाई करते हुए एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने टिप्पणी मेें कहा है कि “शादी के वादे पर अगर लड़की लंबे समय से आपसी सहमति से जिस्मामी संबंध कायम रखती है तो इसे हमेशा रेप नहीं कहा जा सकता है।” कोर्ट ने ये बात महिला की उस याचिका को खारिज करते हुए कही। उक्त महिला ने एक पुरुष के ऊपर रेप का आरोप लगाया था। आरोपों के मुताबिक उस शख्स ने महिला की सहमति से कई महीनों तक उसके साथ संबंध कायम करता रहा।

न्यायधीश विभू बाखरू ने सुनवाई के दौरान कहा कि “यदि किसी के साथ शादी का झूठा वादा कर एक बार बहकाया जाता है तो ये अपराध हो सकता है।” कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि ‘‘कुछ मामलों में शादी का वादा मात्र जिस्मानी संबंध बनाने के लिए किया जा जाता है जबकि दूसरा पक्ष इसके लिए सहमति नहीं रखता है, सिवाय ऐसे मामलों में जहाँ शादी का झूठा वादा करके बिना सहमति के जबरन शारीरिक संबंध बनाए जाते हैं, वहां भारतीय दंड संहित की धारा – 375 के अन्तर्गत रेप का केस बनता है।”

एक अंग्रेजी अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने आगे ये कहा है कि “जहां ऐसे संबंध लंबे समय तक चलते रहते हैं, ऐसे मामलों को इस तरह रेप की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।” इसके साथ ही कोर्ट ने एक ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को जारी रखते हुए उस शख्स को रेप के आरोपों से मुक्त कर दिया। कोर्ट महिला की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें ये कहा गया था कि शख्स ने उसे शादी के नाम पर धोखा दिया है और झूठा वादा करके कई बार संबंध बनाये। साथ ही महिला ने उस शख्स पर आरोप लगाए थे कि उस शख्स ने दूसरी महिला के खातिर उसे छोड़ दिया है।

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि इससे साफ है कि महिला ने अपनी स्वेच्छा से उस शख्स के साथ शारीरिक संबंध स्थापित रखे। वहीं इससे ये दिखाता है कि महिला के मन में भी उस शख्स के प्रति चाह थी। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की उस बात से भी इत्तेफाक रखा कि “उक्त महिला से शारीरिक संबंध बनाने की सहमति शादी का वादा देकर नहीं ली गई थी बल्कि शादी को लेकर बात बाद में हुई थी।”