यमन युद्ध में शक्ति का समीकरण अंसारुल्लाह के पक्ष में मुड़ने, रियाज़ के ख़िलाफ़ मानवाधिकार संबंधी अमरीकी दावों और पड़ोसी देशों पर सऊदी अरब का प्रभाव बहुत कम हो जाने के बाद इस देश की क्षेत्रीय भूमिका धूमिल पड़ती जा रही है।

आज सऊदी जिन हालात से गुज़र रहा है, शायद वह इस देश के इतिहास के सबसे ख़तरनाक हालात हों क्योंकि ऐसा लगता है कि अमरीका की ओर से सऊदी का समर्थन कम हो गया हो गया है। अब तक आतंकी कार्यवाहियों के संबंध में सऊदी की जो सबसे अधिक आलोचना की जाती थी वह अमरीक के कूटनयिकों व सुरक्षा अधिकारियों की ओर से की जाती थी या फिर अमरीका के विपक्षी दल और संचार माध्यम सऊदी अरब के अपराधों में शामिल होने पर अमरीका की आलोचना करते थे लेकिन आज सऊदी अरब पर सीधे अमरीका के राष्ट्रपति जो बाइडेन की तरफ़ से दबाव डाला जा रहा है।

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आज सऊदी के सरकार विरोधी पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या के संबंध में अमरीका की रिपोर्ट जारी होने के बाद सऊदी युवराज मुहम्मद बिन सलमान को अत्यंत कठिन परिस्थिति का सामना है क्योंकि अमरीकी गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक़ इस्तंबोल में सऊदी काउन्सलेट में ख़ाशुक़जी की हत्या करने वाले टीम बिन सलमान से आदेश ले रही थी। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने इस बात को दबाए रखा था।

जो बाइडन पर आंतरिक व अंतर्राष्ट्रीय दबाव इस बात का कारण बना है कि वे ख़ाशुक़जी हत्याकांड के दोषियों को सज़ा देने के लिए क़दम उठाएं। दूसरी तरफ़ सऊदी पिछले 6 साल से यमन के ख़िलाफ़ एक अमानवीय युद्ध छेड़े हुए है जिसमें उसे किसी तरह की सफलता नहीं मिली है बल्कि अब तो वह पराजय की ओर बढ़ रहा है। यमन में सऊदी अरब अपने स्ट्रेटेजिक ठिकाने गंवा चुका है।

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अंसारुल्लाह के मुक़ाबले में उसकी पराजय का एक पहलू यह भी है कि यमनी बल सऊदी के काफ़ी अंदर तक उसके अहम ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। अहम बात यह है कि अंसारुल्लाह के मुक़ाबले में सऊदी अरब की पराजय केवल इस युद्ध तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि इससे उसके भविष्य का रास्ता भी बदल जाएगा। क्षेत्र, इस्लामी देशों और विश्व में उसकी भूमिका और उसका प्रभाव बुरी तरह से प्रभावित होगा और ऐसा लगता है कि सऊदी अरब अपनी पोज़ीशन हमेशा के लिए खो देगा।

यमन युद्ध में अपने निरंतर परायज के साथ ही सऊदी अरब, क़तर की घेराबंदी समाप्त करने पर भी मजबूर हो गया। उसने इस घेराबंदी को ख़त्म करने के लिए जो शर्तें रखी थीं, उनकी भी अनदेखी कर दी और मिस्र व संयुक्त अरब इमारात के विरोध के बावजूद उसने हालात को जस का तस स्वीकार कर लिया।

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लेबनान में साद हरीरी पर सऊदी अरब का काफ़ी प्रभाव है लेकिन वह सरकार के गठन में अपने विचार लेबनान पर थोपने में कामयाब नहीं हो सका। सीरिया में भी सऊदी अरब का प्रभाव ख़त्म हो चुका है क्योंकि उसने कई आतंकी गुटों को सीरिया में सक्रिय करके उत्तरी सीरिया में अपने समर्थित आतंकी संगठनों को फिर से खड़ा करने की कोशिश की थी लेकिन वह इसमें भी नाकाम रहा।

लीबिया में भी सऊदी अरब की कोई भूमिका नहीं रह गई है और लीबिया में तुर्की के सक्रिय रोल के कारण सऊदी अरब ने इस देश में अपना सैन्य रुख़ किनारे रख दिया है और मिस्र व इमारात की तरह इस देश के संकट को राजनैतिक तरीक़े से हल करने पर बल देने लगा है। पाकिस्तान के अधिकारी भी सऊदी अरब से दूर हो चुके हैं और अधिकतर क्षेत्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मामलों में तुर्की से निकट हो गए हैं।

अमरीका व इस्राईल द्वारा अहम क्षेत्रीय मामलों में संयुक्त अरब इमारात के क़रीब होने से यह बात स्पष्ट हो गई है कि सऊदी अरब क्षेत्र व इस्लामी जगत में अपने संपूर्ण प्रभाव और राजनैतिक भूमिका से वंचित हो जाएगा और उसके पास जो बाइडेन की सरकार के पूंजीनिवेशक के अलावा कोई भूमिका नहीं रह जाएगी।