आपकी अभिव्यक्ति

Ravi Nigam , रवि जी. निगम ( संपादक/समाज सेवक )
Ravi G. Nigam , रवि जी.निगम ( संपादक/समाज सेवक )

भारत अंतरराष्ट्रीय मीडिया में वायरस, नरक और मोदी चर्चा में….? हुज़ूर अब भी नहीं मानोंगे कि देश गर्त में जा रहा है, अभी तक हम जैसे कुछ लोग ही आपकी आलोचना कर रहे थे, और आलोचना की मुख्य वजह होती है किसी विशिष्ठ का ध्यान किसी विशेष विषय वस्तु की ओर केंद्रित करना, अब आपका तो पता नहीं, लेकिन मैं उस काव्य पाठ पर विश्वास अवश्य करता हूँ जिसमे कहा गया है कि “निंदक नीयरे राखिये, आंगन कुटी छवाय” अर्थात आलोचक ही वो सच्चा मित्र होता है जो आपको आपकी त्रुटि से अवगत कराता है, उसका ये कतई मतलब नहीं होता है कि वो आपका सदैव उपहास करने वाला पात्र होता है, वो आपको आगाह करता है।

लेकिन आपको ये भी पूरी तरह ज्ञात होगा कि “बिकाऊ कभी टिकाऊ नहीं होता है” वो हर वक्त इसी फिराक़ में होता है कि मौका हाँथ लगे तो उसका मोल किया जा सके, अर्थात आपकी भाषा में “आपदा को अवसर में तब्दील करना”, इसी लिये एक कहावत और भी प्रसिद्ध है जो हमारे पूर्वजों ने बनायी है कि चार चापलूसों से अच्छा एक आलोचक होता है जो कभी भी आपको धोके में नहीं रखता, बल्कि वो आपको सचेत करता रहता है, लेकिन चापलूस सदैव मुसीबत में ही डालता रहता है, वहीं कुछ ऐसे भी आलोचक होते हैं जो राह भी खोजने में मदद करते हैं, लेकिन चापलूस ताउम्र चापलूसी ही करता है और मुसीबत में ही उलझाता रहता है।

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मेरे हुज़ूर अब इन चापलूसों से मुक्त होइये और इसका आंकलन कीजिये कि क्या खोया क्या पाया ? अन्यथा वो दिन दूर नहीं जब सारा राजपाठ छिन चुका होगा, और सांप निकल जानें के बाद लकीर पीटनें से कुछ हाँसिल नहीं होगा, और “फिर पछताये होत का, जब चिडिया चुग गयी खेत,” अभी भी वक्त है वक्त की नज़ाकत को समझिये और पुन: विचार कीजिये सुझाव पर जो आपको इस भंवरजाल से निकाल सकता है, क्योंकि यदि विशेषज्ञों की बात मानें तो फिलहाल देश या देश की जनता कोरोना मुक्त नहीं होने जा रही है, आपकी वैक्सीन भी ज्यादा से ज्यादा किसी भी व्यक्ति को 2 साल से ज्यादा प्रोटेक्ट नहीं कर सकती, जिनमें से ऐसे भी लोग हैं जो 2,4, 6 महिने के भीतर उनका इम्यून पॉवर खत्म हो जाता है ऐसा मानना वैज्ञानिकों का है कि नहीं ?

यदि आपने पिछले 10 माह पूर्व ही इस सुझाव पर अमल कर लिया होता तो क्या जो दृश्य आज देश का है क्या इतना भयावह होता, जिस तरह से प्रवासी श्रमिकों और अन्य के लिये आपने ट्रेन चलाने के सुझाव को माना और अमल किया वो आज भी कारगर है कि नहीं ? अब आपको ये लगता होगा कि मैं इस बात को बार-बार लिखकर आपको अपमानित करता हूँ तो ऐसा बिल्कुल नहीं है, मुझे इसे बार-बार इस लिये लिखना पडता है कि आप खिन्न होने के कारण उस सुझाव को नहीं लागू करना चाह रहे हो जो देश और देश के हित में है, ऐसा न करना ही आपके अहम को दर्शाता है, इससे आप हमारा नहीं कहीं न कहीं देश और देश की जनता का नुक्सान कर रहे हैं हो सकता हो आप इसे जान बूझकर न कर रहे हों।

लेकिन ये भी सच है कि इससे देश का नाम विदेशों में भी धूमिल हो रहा है, सायद इससे आपको कोई खाश फर्क़ भी न पडता हो, क्योंकि देश का मीडिया घराना तो आपके ही साथ है यही न ? लेकिन मीडिया घराना क्योंकर आपके साथ है ये भी आप भली-भांति जानते हैं कि नहीं ? लेकिन सायद आप ये अवश्य भूल रहे हैं कि आज जिनके अपने-अपनों से जुदा हो रहे हैं वो सायद इसे नहीं भूलेंगे ? आपको इसका हिसाब जल्द ही देना होगा और हो सकता है लोग मन भी बना चुके हों, बल्कि इतना ही नहीं इसका परिणाम जल्द ही आपके समक्ष भी हो ? अब विचार आपको करना है ? क्योंकि आपको तो जनता ने चुना है न ?

भारत अंतरराष्ट्रीय मीडिया में वायरस, नरक और मोदी चर्चा में….?

कोरोना वायरस महामारी को हैंडल करने को लेकर द ऑस्ट्रेलियन द्वारा मोदी सरकार की कड़ी आलोचना पर भारत सरकार आग-बबूला हो गई है और उसने अख़बार की इस रिपोर्ट को बेबुनियाद और निंदनीय बताया है।

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हालांकि भारत में कोरोना वायरस ने जो तबाही मचा रखी है और एक क़यामत बरपा है, उसे लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में मोदी सरकार की व्यापक आलोचना जारी है, लेकिन द ऑस्ट्रेलियन की रिपोर्ट पर भारत ने कड़ा रुख़ अपनाया है, जिसमें प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की अंहकार, कट्टर राष्ट्रवाद और ग़लत नीतियों को महामारी का विक्राल रूप लेने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया है।

द ऑस्ट्रेलियन के एडिटर-इन-चीफ़ क्रिस्टोफर डो के नाम पत्र में, कैनबरा स्थित भारतीय उच्चायोग ने इस लेख को पूरी तरह से आधारहीन, दुर्भावनापूर्ण और निंदनीय बताते हुए अख़बार से अपनी ग़लती सुधारने की मांग की है।

भारत में मीडिया से जुड़े सूत्रों का कहना है कि मोदी सरकार जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा आलोचना को सहन नहीं कर सकती, तो भारतीय मीडिया को किस दबाव का सामना करना पड़ रहा होगा, इससे बख़ूबी अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

फ़िलिप शेरवेल द्वारा लिखा गया यह विचाराधीन लेख, मूल रूप से शनिवार को द टाइम्स में “मोदी ने भारत को लॉकडाउन से निकालकर नरक में झोंक दिया”, शीर्षक के तहत प्रकाशित हुआ था। उसके एक दिन बाद “मोदी ने भारत को एक वायरस नरक में झोंक दिया है” शीर्षक के तहत यह लेख पुन: ऑस्ट्रेलियाई अख़बार में प्रकाशित हुआ।

हालांकि भारत में कोरोना वायरस महामारी की जारी दूसरी भयानक लहर पर द गार्डियन, द न्यूयॉर्क टाइम्स और हारेट्ज़ जैसे अख़बारों ने विस्तृत रिपोर्टें प्रकाशित की हैं। इन लेखों में मोदी को एक कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी नेता बताया गया है, जो “अति-आत्मविश्वास से ग्रस्त” है, और अपनी “मज़बूत छवि” की धारणा से पीड़ित है, क्योंकि वह “एक अंहकारी और अक्षम सरकार” का मुखिया है।

जबकि द ऑस्ट्रेलियन में प्रकाशित आर्टिकल में शेरवेल ने कोरोना की आग में जलते भारत के लिए “अहंकार, कट्टर-राष्ट्रवाद और नौकरशाही की अक्षमता को इस भयानक संकट के लिए संयुक्त रूप से ज़िम्मेदार ठहराया है। इसलिए कहा जा सकता है कि मोदी सरकार की आलोचना का लहजा द ऑस्ट्रेलियन का भी वही है, जो अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया का है। बस इसने सत्ताधारी बीजेपी पार्टी और मोदी सरकार की ध्रुवीकरण, लाशों की राजनीति, भीड़ से प्यार, किसी भी क़ीमत पर सत्ता हासिल करने की कोशिश जैसी दुखती रग पर हाथ रख दिया है, जिसे मोदी सरकार सहन नहीं कर सकी।

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शेरवेल का कहना है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञों की बार-बार चेतावनी और देश में ऑक्सीजन और वैक्सीन की कमी के बावजूद, सरकार ने कुंभ मेले जैसे धार्मिक समारोहों के बेरोकटोक आयोजन और विशाल चुनावी रैलियों की अनुमति देकर पूरे मुल्क को श्मशान और क़ब्रिस्तान में बदल दिया है।

जब कोरोना की दूसरी लहर भारत को अपनी चपेट में ले रही थी और लाखों मरीज़ ज़िंदगी की लड़ाई लड़ रहे थे, उस समय मोदी अपने समर्थकों को देखकर इतने उत्साहित हुए कि कहने लगेः मैंने कभी इतनी भीड़ नहीं देखी है, मैं जहां देख सकता हूं, मुझे लोग ही लोग दिखतें हैं, बाक़ी कुछ दिखता ही नहीं है। 

(सौ. पी.टी.)