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Monday, November 28, 2022

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मध्यपूर्व को लेकर पश्चिम की विनाशकारी नीतियों की आलोचना यूरोपीय सांसद ने की

आयरलैंड से यूरोपीय संसद की सदस्य क्लेर डाली ने मध्यपूर्व को लेकर पश्चिम की नीतियों की कड़ी आलोचना की है। डाली का मानना है कि समस्याएं और संकट उत्पमध्यपूर्व को लेकर पश्चिम की विनाशकारी नीतियों की आलोचनान्न करने के अलावा इन नीतियों का कोई परिणाम नहीं निकला है। हालांकि पश्चिम हमेशा से ही मध्यपूर्व में शांति और स्थितरता की स्थापना का दावा करता रहा है।

गुरुवार को अपने ट्वीट में डाली ने लिखाः मध्यपूर्व में अमरीका और यूरोप के कई दशकों के वर्चस्व के परिणाम स्वरूप, इस क्षेत्र में आतंकवाद, प्रॉक्सी वार्स, सरकारों का तख़्तापलट और हिंसा के अलावा कोई नतीजा नहीं निकला है। अब हम देख रहे हैं कि यूरोपीय संघ अपने हाथ झाड़ रहा है और यह सोचने में लगा हुआ है कि इस क्षेत्र में स्थिरता कैसे लाई जाए? क्या यह किसी मज़ाक से कम है।

यूरोपीय सांसद ने मध्यपूर्व में पश्चिम की विनाशकारी नीतियों की कड़ी आलोचना तो की है, लेकिन पश्चिम आज भी इस क्षेत्र में अपनी पुरानी नीतियों को ही आगे बढ़ाने पर आग्रह कर रहा है और वह अतीत से कोई सबक़ नहीं लेना चाहता है। मध्यवूर्व को लेकर अमरीका और यूरोप की नीतियों की चीन और रूस जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमरीका के प्रतिस्पर्धी भी आलोचना करते रहे हैं।

रूस ने हमेश से मध्यपूर्व में अमरीका और यूरोप के हस्तक्षेप की निंदा की है और कहा है कि इस क्षेक्ष की ज़मीनी वास्तविकताओं और संस्कृति को नज़र अंदाज़ करते हुए अमरीका ने इस क्षेत्र के देशों पर पश्चिमी लोकतंत्र थोपने का प्रयास किया है, जिसके परिणाम में आतंकवाद को फलने फूलने का मौक़ा मिला है।

मास्को और बीजिंग का मानना है कि ऊर्जा और प्राकृतिक स्रोतों से संपन्न इस क्षेत्र पर पश्चिम अपने पंजे गाढ़े रखना चाहता है और अपने मूल्यों को यहां के लोगों पर थोप रहा है। सीरिया, लीबिया और इराक़ का उदाहर पेश करते हुए रूसी और चीनी अधिकारी कहते हैं कि इन देशों के प्राकृतिक स्रोतों को लेटने के लिए अमरीका और यूरोपीय देशों ने इन देशों की जनता को नरक में धकेल दिया है।

पश्चिम ने मध्यपूर्व में अपने हस्तक्षेप के लिए हमेशा ही लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना का बहाना बनाया है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन पश्चिम की इस साज़िश की आलोचना करते हुए कहते हैं कि अगर आंतरिक सामाजिक परिवर्तनों की ज़रूरत महसूस भी की जाए तो उसका प्रयास ख़ुद इन देशों की जनता द्वारा होना चाहिए न कि इस क्षेत्र से बाहर की शक्तियां यहां आकर परिवर्तनों को यहां की जनता पर थोपें।

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