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महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल मचाने वाले दो बड़े सवाल — “कौन है असली शिवसेना?” और “कौन है असली एनसीपी?” — का जवाब अब साल 2026 में मिलने वाला है। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पार्टियों के चुनाव चिन्ह विवाद की सुनवाई को 21 जनवरी 2026 तक के लिए टाल दिया है। कोर्ट ने यह फैसला बुधवार, 12 नवंबर 2025 को सुनवाई के दौरान सुनाया।
शिवसेना (यूबीटी) ने निर्वाचन आयोग द्वारा एकनाथ शिंदे समूह को “शिवसेना” मानते हुए ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिन्ह देने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले को अगली सुनवाई तक स्थगित करने का निर्णय लिया। कोर्ट ने यह भी माना कि शिवसेना और एनसीपी, दोनों के मामलों में समान मुद्दे हैं, इसलिए इन पर एक साथ सुनवाई होगी।
एनसीपी (शरद पवार) गुट की ओर से भी फरवरी 2024 में निर्वाचन आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें अजित पवार गुट को पार्टी का चुनाव चिन्ह “घड़ी” प्रदान किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर भी विचार करने पर सहमति जताई और दोनों मामलों को एक साथ सुनने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 21 जनवरी 2026 को सुनवाई होगी और यदि आवश्यक हुआ तो 22 जनवरी को भी सुनवाई जारी रहेगी। इस मामले में शिवसेना (यूबीटी) की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी और देवदत्त कामत पेश हुए, जबकि एकनाथ शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी और एन.के. कौल ने पक्ष रखा।
उद्धव ठाकरे गुट का कहना है कि चुनाव आयोग ने पार्टी के भीतर बहुमत का सही मूल्यांकन नहीं किया और निर्वाचित विधायकों की संख्या को अधिक महत्व दिया, जबकि संगठनात्मक बहुमत को नजरअंदाज किया गया। कोर्ट ने उद्धव गुट को शिवसेना (यूबीटी) नाम और “जलती मशाल” चुनाव चिन्ह इस्तेमाल करने की अनुमति दी है, जब तक यह मामला लंबित है।
इसी तरह, शरद पवार गुट को फिलहाल “तुरही लिए आदमी” का चुनाव चिन्ह इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है। वहीं अजित पवार गुट को प्रचार के दौरान यह बताने के निर्देश दिए गए हैं कि “घड़ी” चुनाव चिन्ह पर विवाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

