नई दिल्ली: भारतीय मुद्रा रुपये ($₹$) के मूल्य में लगातार आ रही कमजोरी ने इस समय देश के आर्थिक हलकों में एक गंभीर बहस छेड़ दी है। आमतौर पर माना जाता है कि यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था अपने प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में तेजी से बढ़ रही हो, तो उसकी मुद्रा मजबूत होनी चाहिए। हालांकि, भारत के मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अब तक के 12 वर्षों के कार्यकाल पर नजर डालें, तो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में कुल 62.33 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की जा चुकी है।
पीएम मोदी के तीनों कार्यकालों का आंकड़ा
डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी का यह सफर मोदी सरकार के तीनों कार्यकालों में लगातार जारी रहा है:
- प्रथम कार्यकाल (2014): जब 26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, तब एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 58.94 रुपये थी।
- द्वितीय कार्यकाल (2019): पांच साल बाद 30 मई 2019 को जब वे दोबारा सत्ता में आए, तब रुपये में 17% से अधिक की गिरावट आ चुकी थी और डॉलर 69.37 रुपये पर पहुंच गया था।
- तृतीय कार्यकाल (2024): जून 2024 में तीसरे कार्यकाल की शुरुआत के समय रुपया 83.38 के स्तर पर था (यानी 2019 से 2024 के बीच 20% से ज्यादा की गिरावट)।
- वर्तमान स्थिति (2026): अब तीसरे कार्यकाल के दो साल पूरे होने पर रुपया प्रति डॉलर करीब 96 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है, जिसमें इन दो वर्षों में ही 14.75% की गिरावट देखी गई है।
मनमोहन सिंह सरकार में भी गिरा था रुपया
हालांकि, वित्तीय जानकारों का कहना है कि रुपये के कमजोर होने का यह सिलसिला केवल मौजूदा सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर दौर में रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के 10 वर्षों के (2004-2014) शासनकाल के दौरान भी रुपये में 31.65 प्रतिशत की गिरावट आई थी। मई 2004 में जब मनमोहन सिंह ने कमान संभाली थी तब एक डॉलर की कीमत 45.31 रुपये थी, जो उनके पद छोड़ते समय (मई 2014) 60 रुपये के करीब पहुंच चुकी थी।
प्रशंसक भी हैरान: विकास दर तेज तो रुपया कमजोर क्यों?
इस समय सबसे बड़ा और पेचीदा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी के बावजूद रुपया लगातार क्यों टूट रहा है? एक समय में पीएम मोदी की आर्थिक नीतियों के कड़े प्रशंसक रहे प्रख्यात अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने भी इस विरोधाभास पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, यदि देश की आर्थिक तरक्की की रफ्तार इतनी मजबूत है, तो करेंसी का इस तरह रिकॉर्ड स्तर पर गिरना नीतिगत स्तर पर गहन समीक्षा की मांग करता है।

