कंजूरमार्ग डंपिंग ग्राउंड मामले में सुनवाई; BMC को नियमों का कड़ाई से पालन कराने और 1 सप्ताह के भीतर कार्रवाई के निर्देश
मुंबई:
बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार को सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकने वाले लोगों के दोहरे रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने सवाल उठाया कि भारत में सार्वजनिक जगहों पर बिना किसी संकोच के कचरा फेंकने वाले लोग विदेशों में जाते ही नियमों का पूरी ईमानदारी से पालन क्यों करने लगते हैं।
हाईकोर्ट ने पूछा कि “क्या स्वतंत्रता और लोकतंत्र का मतलब यही है कि लोग सार्वजनिक स्थानों को गंदा करने की छूट समझ लें?”
‘स्वच्छ वातावरण केवल अधिकार नहीं, नागरिक जिम्मेदारी भी’
कंजूरमार्ग डंपिंग ग्राउंड के आसपास रहने वाले निवासियों द्वारा प्रदूषण, दुर्गंध और स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जी.एस. कुलकर्णी और न्यायमूर्ति आरती साठे की पीठ ने कई कड़े सवाल उठाए:
- दोहरे रवैये पर प्रहार: अदालत ने कहा कि कई लोग भारत में बिना झिझक सड़क पर कचरा फेंक देते हैं, लेकिन वही लोग विदेश जाते ही चॉकलेट के छोटे-से रैपर को भी डस्टबिन में ही डालते हैं।
- सभ्य समाज पर सवाल: हाईकोर्ट ने मुंबई के समुद्र तटों (Beaches) और सड़कों पर फैले प्लास्टिक कचरे का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में क्या हम खुद को एक सभ्य समाज कह सकते हैं?
- सिर्फ नारा न बने अभियान: अदालत ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के ‘स्वच्छ मुंबई, सुंदर मुंबई’ अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि नागरिकों की लापरवाही और प्रशासन की ढिलाई मिलकर इस अभियान के उद्देश्य को विफल कर रही है।
धरोहर स्थलों के आसपास गंदगी पर चिंता, BMC को 1 सप्ताह का अल्टीमेटम
अदालत ने राजाबाई टावर, बॉम्बे हाईकोर्ट भवन और अन्य विरासत (Heritage) स्थलों के आसपास नगर निगम की कचरा ढोने वाली गाड़ियों के अनुचित प्रबंधन पर भी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि इन ऐतिहासिक स्थलों पर देश-विदेश से पर्यटक आते हैं और सड़कों पर फैला कचरा पूरे शहर की छवि को नुकसान पहुंचाता है।
हाईकोर्ट के मुख्य निर्देश:
- नगर निगम के अधिकारी स्वच्छता नियमों का उल्लंघन करने वालों पर बिना किसी नरमी के कड़ा जुर्माना और कानूनी कार्रवाई करें।
- बीएमसी (BMC) वार्ड स्तर पर अपनी सफाई व्यवस्था को और मजबूत करे ताकि सार्वजनिक सड़कें कचरा फेंकने का अड्डा न बनें।
- हाईकोर्ट ने नगर निगम को इस पूरी समस्या के समाधान के लिए एक सप्ताह (7 दिन) का समय दिया है। तय समय में ठोस कार्रवाई न होने पर कोर्ट सख्त आदेश पारित करेगा।

