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Thursday, July 9, 2026

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ठाणे कोर्ट का बड़ा फैसला: जेल अधिकारियों पर हमले के आरोपी कैदी को किया बरी; सीसीटीवी फुटेज छिपाने पर सेशंस कोर्ट ने जताई जेल प्रशासन पर नाराजगी

ठाणे: महाराष्ट्र के ठाणे (Thane) की एक विशेष सेशंस कोर्ट ने जेल के भीतर सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों पर जानलेवा हमला करने के आरोपी एक 25 वर्षीय कैदी को सभी आपराधिक आरोपों से पूरी तरह बरी (Acquit) कर दिया है। इस कैदी पर साल 2017 में ठाणे सेंट्रल जेल (Thane Central Jail) के भीतर धारदार हथियार से ड्यूटी पर तैनात जेल अधिकारियों पर हमला करने का संगीन आरोप लगा था। अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में अभियोजन पक्ष (सरकारी पक्ष) की थ्योरी को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वे आरोपी के खिलाफ लगे आरोपों को कानूनन और तार्किक रूप से साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं। ठाणे कोर्ट के एडिशनल सेशंस जज जीटी पवार ने 11 जून 2026 को यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी अरमान नफीस खान को तत्काल रिहा करने और सभी विधिक आरोपों से मुक्त करने का आदेश जारी किया।

क्या था मामला? सरकारी दावों पर कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल

सरकारी अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत में पेश की गई कहानी के मुताबिक, यह कथित घटना 2 मार्च 2017 की है। जेल प्रशासन का दावा था कि ठाणे सेंट्रल जेल की अति-सुरक्षित हाई-सिक्योरिटी बैरक (High-Security Barrack) में बंद कैदी अरमान खान ने अचानक हिंसक होकर वहां तैनात जेल अधिकारी संभाजी पिसे और दो अन्य साथी सुरक्षा कर्मचारियों पर लोहे की एक तीखी पत्ती (धारदार पत्ती) से हमला कर दिया था, जिससे वे घायल हो गए थे।

हालांकि, सेशंस कोर्ट में चली लंबी कानूनी सुनवाई के दौरान जज ने सरकारी पक्ष की इस पूरी कहानी में कई बड़ी और संदिग्ध विधिक कमियां पाईं। जज जीटी पवार ने अपने फैसले में विशेष रूप से नोट किया कि यह कथित घटना जेल परिसर के भीतर सरेआम हुई थी, जहां उस समय सुरक्षा वार्डन के अलावा सैकड़ों अन्य कैदी भी प्रत्यक्ष रूप से मौजूद थे। इसके बावजूद, जांच एजेंसी कोर्ट के सामने एक भी स्वतंत्र कैदी या बाहरी गवाह को बतौर चश्मदीद सबूत (Eyewitness) पेश करने में नाकाम रही, जिससे घटना की सत्यता संदिग्ध हो जाती है।

खुद की पिटाई छुपाने के लिए जेल कर्मियों ने दर्ज कराई झूठी एफआईआर!

अदालती कार्यवाही के दौरान जेल प्रशासन और वहां के मेडिकल स्टाफ का रवैया भी बेहद संदिग्ध पाया गया। कोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि आरोपी कैदी अरमान खान के शरीर पर भी घटना के वक्त कई गंभीर चोटों के निशान मौजूद थे, जिसके बारे में जेल अधिकारियों ने कोर्ट को कोई साफ और तार्किक वजह नहीं बताई।

अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को सही माना कि संभवतः पहले जेल सुरक्षाकर्मियों ने ही मिलकर बैरक के भीतर कैदी की बेरहमी से पिटाई की थी और बाद में खुद पर होने वाली विभागीय व कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए उन्होंने कहानी गढ़कर कैदी के खिलाफ ही यह झूठी एफआईआर (FIR) दर्ज करा दी।

सबसे अहम सबूत ‘सीसीटीवी फुटेज’ छिपाने पर बरसे जज

सुनवाई के दौरान ठाणे कोर्ट ने मामले की जांच करने वाले स्थानीय पुलिस अधिकारियों और जेल प्रशासन के बीच के अंतर्विरोधों को भी उजागर किया। अदालत ने नोट किया कि घटना के तुरंत बाद जब स्थानीय पुलिस के जांच अधिकारी (IO) साक्ष्य जुटाने जेल पहुंचे, तो जेल प्रशासन ने उन्हें घटनास्थल (Crime Scene) पर तुरंत जाने की कानूनी इजाजत नहीं दी और घंटों तक मामले को लटकाए रखा।

इससे भी बड़ी बात यह रही कि आधुनिक जेल के भीतर लगे कैमरों की सीसीटीवी फुटेज (CCTV Footage), जो इस पूरी घटना का सबसे निष्पक्ष और अहम डिजिटल सबूत हो सकती थी, उसे कोर्ट के सामने पेश ही नहीं किया गया और जानबूझकर छिपा लिया गया। माननीय जज ने कड़े शब्दों में कहा कि इन विधिक चूकों और साक्ष्यों को गायब किए जाने के कारण सरकारी कहानी पर गहरा संदेह (Reasonable Doubt) पैदा होता है। कानून के स्थापित सिद्धांतों के तहत संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) आरोपी को मिलना चाहिए, जिसके आधार पर अरमान खान को बरी किया जाता है।

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