29.2 C
Mumbai
Saturday, July 11, 2026

आपका भरोसा ही, हमारी विश्वसनीयता !

सुप्रीम कोर्ट में भारी हंगामा: याचिकाकर्ता ने जजों को कहा ‘न्यायिक नौकर’ और हवा में उछाले कागज; पीठ ने दिमागी हालत देख बिना सजा के छोड़ा

नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में शुक्रवार (10 जुलाई 2026) को एक बेहद हैरान और विचलित करने वाली घटना सामने आई है। एक मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अपना मानसिक आपा खोते हुए जजों को सरेआम ‘न्यायिक नौकर’ (Judicial Servant) कह दिया और देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के खिलाफ अमर्यादित अपशब्दों का प्रयोग किया।

इस अभूतपूर्व और गंभीर उकसावे के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के जजों ने विधिक गरिमा और गजब के धैर्य का परिचय दिया। जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने याचिकाकर्ता की स्थिति को भांपते हुए उसके खिलाफ अवमानना (Contempt of Court) की कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की और उसे बिना किसी सजा के जाने दिया। जजों के इस न्यायिक बड़प्पन और संयम की कानूनी बिरादरी और सोशल मीडिया पर जमकर सराहना हो रही है।

1. कोर्ट रूम का घटनाक्रम: ‘मैं संप्रभु हूँ, आपको आदेश देता हूँ’

यह पूरा विधिक विवाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) से जुड़ा था:

  • याचिकाकर्ता: प्रबल प्रताप नामक व्यक्ति इस मामले में वकील के बिना खुद (In-Person) पैरवी करने कोर्ट पहुंचा था।
  • हंगामा और रौब: सुनवाई शुरू होते ही प्रबल प्रताप जजों पर चिल्लाने लगा। खुद को ‘संप्रभु’ (Sovereign) बताते हुए उसने पीठ से कहा, “मिस्टर जुडिशियल सर्वेंट, मैं आपको आदेश देता हूँ कि आप लखनऊ के एसीपी विकास नगर के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने का आदेश जारी करें।”
  • कागज हवा में उड़ाए: जब जस्टिस विश्वनाथन ने आश्चर्य जताते हुए पूछा कि क्या वह अदालत को आदेश दे रहा है, तो माहौल और बिगड़ गया। याचिकाकर्ता ने गुस्से में केस की फाइलें और विधिक दस्तावेज हवा में फेंक दिए। जब सुरक्षाकर्मी उसे बाहर ले जाने लगे, तो उसने सीजेआई के खिलाफ भी बेहद आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया।

2. जजों ने आखिर क्यों दिखाई विधिक सहानुभूति?

इतनी बड़ी बदतमीजी के बाद भी पीठ ने जो विधिक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाया, उसकी कड़ियां नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट हैं:

अदालत की कार्रवाईलिया गया विधिक निर्णय / आधार
मानवीय दृष्टिकोणपीठ ने अपने लिखित विधिक आदेश में साफ किया कि याचिकाकर्ता की स्पष्ट मानसिक और शारीरिक स्थिति को देखते हुए वे उसके खिलाफ कोई दंडात्मक एक्शन नहीं लेना चाहते।
मामले की विधिक मेरिटजजों ने हंगामे से ध्यान भटकाए बिना ठंडे दिमाग से केस के कानूनी तथ्यों को परखा।
अंतिम विधिक फैसलाकोर्ट को इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में कोई विधिक खामी नहीं मिली, जिसके बाद प्रबल प्रताप की याचिका को पूरी तरह खारिज (Dismissed) कर दिया गया।

3. इस हैरान करने वाली घटना के 5 मुख्य बिंदु

कोर्ट रूम अवमानना घटनाक्रम⎩⎧​1. जजों का अपमान:2. सीजेआई पर टिप्पणी:3. विधिक फाइलों की अवमानना:4. दंडात्मक कार्रवाई से छूट:5. निष्पक्ष न्याय:​याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप ने जजों को सरेआम ’न्यायिक नौकर’ कहकर संबोधित किया।अदालत कक्ष से बाहर ले जाए जाते समय देश के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अपशब्द कहे।गुस्से में आकर केस से जुड़े तमाम विधिक कागजात अदालत के भीतर हवा में उड़ा दिए।जजों ने याचिकाकर्ता की मानसिक स्थिति को भांपते हुए अवमानना का केस दर्ज नहीं किया।बिना किसी पूर्वाग्रह के मामले को विशुद्ध रूप से कानून के दायरे में परखकर खारिज किया।​

4. कानूनी बिरादरी की प्रतिक्रिया: ‘यह न्यायिक बड़प्पन की मिसाल है’
इस घटना का विवरण बाहर आते ही देश के वरिष्ठ वकीलों ने जजों के व्यवहार की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने अधिवक्ता डॉ. अलख आलोक श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर लिखा कि जस्टिस केवी विश्वनाथन का यह रूप विधिक गरिमा को बढ़ाने वाला और प्रेरणादायक है। हालांकि, उन्होंने याचिकाकर्ता की इस हरकत की कड़ी निंदा भी की। उन्होंने कहा कि अदालतों में मुकदमों की पेंडेंसी (देरी) की वजह से जनता में गुस्सा होना समझ आता है, लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत में ऐसा गंदा व्यवहार कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उन्होंने रेखांकित किया कि मुकदमों के लंबित रहने के लिए केवल कोर्ट नहीं, बल्कि कार्यपालिका (सरकारें) भी जिम्मेदार हैं।

ताजा खबर - (Latest News)

Related news

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here