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Friday, September 18, 2026

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हिमालय में तेजी से घट रहा बर्फ का भंडार: ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार 65% बढ़ी, टिपिंग प्वाइंट को लेकर बढ़ी चिंता

ब्लैक कार्बन से तेजी से पीछे हट रही बर्फ, जल संकट और खतरनाक झीलों के बनने का मंडराया खतरा

नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान में हो रही लगातार वृद्धि के चलते हिमालयी क्षेत्र एक अभूतपूर्व और गंभीर पर्यावरणीय संकट के मुहाने पर पहुंच गया है। हालिया वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, बीते एक दशक की तुलना में हिमालय के विशाल ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार में 65 प्रतिशत की चौंकाने वाली बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पर्वतीय चोटियों पर बर्फ के आवरण में आ रही यह तीव्र गिरावट भविष्य में नदियों के जल प्रवाह, मैदानी इलाकों की कृषि सिंचाई, पनबिजली उत्पादन और शहरों की पेयजल आपूर्ति के लिए बड़े खतरे की घंटी बन चुकी है।

ब्लैक कार्बन बढ़ा रहा पिघलने की गति, बन रहीं खतरनाक झीलें ग्लेशियरों के इस अप्रत्याशित विनाश के पीछे बढ़ते प्रदूषण और बर्फ पर जमने वाले ‘ब्लैक कार्बन’ यानी सूक्ष्म कालिख कणों की बड़ी भूमिका सामने आई है। यह काली परत सूर्य की किरणों को परावर्तित करने के बजाय गर्मी सोख लेती है, जिससे बर्फ तेजी से पिघलने लगती है। बर्फ के तेजी से पीछे हटने के कारण संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में अनियंत्रित और खतरनाक हिमनद झीलें (ग्लेशियल लेक) बन रही हैं, जिससे प्राकृतिक तटबंध टूटने और विनाशकारी बाढ़ का खतरा कई गुना बढ़ गया है। इसके अलावा, बर्फ पिघलने से कई पहाड़ी ढलानों की स्थिरता भी कमजोर हो रही है।

‘टिपिंग प्वाइंट’ को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों ने दी चेतावनी पर्यावरण वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि आने वाले कुछ दशकों में हिमालय से निकलने वाली प्रमुख नदी घाटियों में जल की उपलब्धता में भारी असंतुलन और गिरावट देखने को मिल सकती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ अब हिमालय के संभावित ‘टिपिंग प्वाइंट’ को लेकर अत्यधिक चिंतित हैं। टिपिंग प्वाइंट से आशय उस अपरिवर्तनीय और निर्णायक मोड़ से है, जिसके पार पहुंचने के बाद पर्यावरणीय बदलावों की रोकथाम करना या ग्लेशियरों को उनकी पुरानी सामान्य स्थिति में लौटाना व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाएगा।

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