कैंटीनों में अलग-अलग व्यवस्था से पूर्व जवान परेशान, गांधीनगर बीएसएफ फ्रंटियर पर मनमानी का दावा
नई दिल्ली: केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (सीएपीएफ) के सेवानिवृत्त जवानों और अधिकारियों को कैंटीन से मिलने वाली लिकर (शराब) के कोटे को लेकर विवाद गहरा गया है। विभिन्न बलों की कैंटीनों में नियमों की भिन्नता और मनमानी व्यवस्था के चलते पूर्व सैनिकों में भारी रोष है। कई स्थानों पर एक बल की कैंटीन में दूसरे अर्धसैनिक बल के रिटायर्ड कर्मियों को शराब देने से साफ इनकार किया जा रहा है, तो कहीं निर्धारित छह बोतलों के स्थान पर केवल दो बोतलें ही थमाई जा रही हैं। इसके अलावा अग्रिम भुगतान (एडवांस) को लेकर भी अलग-अलग बलों में अलग-अलग प्रक्रियाएं अपनाई जा रही हैं।
सीएलएमएस नियमों की धज्जियां उड़ाने का आरोप ‘अलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन’ ने इस व्यवस्था पर कड़ी आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया है कि सेंट्रल लिकर मैनेजमेंट सिस्टम (सीएलएमएस) द्वारा तय किए गए एकीकृत दिशा-निर्देशों की खुली अवहेलना की जा रही है। एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह ने विशेष रूप से गांधीनगर बीएसएफ फ्रंटियर पर सवाल उठाते हुए कहा कि वहां पूर्व अर्धसैनिकों को सुविधा प्रदान करने के बजाय अनावश्यक अड़चनें पैदा की जा रही हैं और केंद्रीय पोर्टल के नियमों का पालन नहीं हो रहा है।
आईटीबीपी है नोडल एजेंसी, फिर भी समन्वय का अभाव गौरतलब है कि गृह मंत्रालय के अधीन सभी अर्धसैनिक बलों में शराब वितरण प्रक्रिया को पारदर्शी और सुगम बनाने के लिए ‘सेंट्रल लिकर मैनेजमेंट सिस्टम’ (सीएलएमएस) लागू किया गया था और इसके संचालन के लिए भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) को नोडल एजेंसी की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर बीएसएफ, सीआरपीएफ, सीआईएसएफ, एसएसबी और आईटीबीपी की स्थानीय कैंटीनों के बीच समन्वय की भारी कमी नजर आ रही है। पूर्व सैनिकों के कल्याणकारी संगठनों ने गृह मंत्रालय से तुरंत हस्तक्षेप कर सभी कैंटीनों में एक समान नियम और कोटा वितरण व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है।

