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“फ़ानूस बनके जिसकी हिफ़ाजत संवैधानिक संस्थान करें, वो सरकार क्या डरे जिसे रौशन सुप्रीम संस्थान करें,” – रवि जी. निगम

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यही कारण है मरते बिलखते लोग, देश का मुखिया बेखौफ़..!!

संपादकीय –

समाजसेवक / संपादक – रवि जी. निगम

ये देश की विवशता ही है जब देश का उच्च न्यायालय ही न्याय के लिये जद्दोजहद करता हुआ दिख रहा हो, सायद ही आजादी के सत्तर वर्षो बाद देश में ऐसा कुछ देखने को मिला हो, आज देश उस कगार पर है जब विधायिका न्यायपालिका पर हावी होती दिख रही है, आज देश के संवैधानिक संस्थान पंगु या बौने से नज़र आ रहे हैं, अब तो हालात कुछ ऐसे हैं संस्थाने अपने विवेक के वजाय किसी व्यक्ति विशेष के दिशा निर्देशन पर कार्य करने पर विवश हैं, ऐसी कौन सी महाशक्ति है उस व्यक्ति विशेष में जिसके आगे बड़े से बड़े नतमस्तक नज़र आते हैं ?

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क्योंकि देश कोरोना महामारी से कराह रहा है। वहीं मरते बिलखते लोग और देश का मुखिया बेखौफ आखिर क्यों ? क्योंकि उसे साफ पता है कि “फ़ानूस बनके जिसकी हिफ़ाजत हवा करें, वो समां क्या बुझे जिसे रौशन खुदा करें,” यही कारण है कि वो बेखौफ है ?

क्योंकि जब दस माह पूर्व एक सुझाव प्रस्तुत किया गया था जब देश कोरोना से दहल रहा था और हम केरोना में विश्व में दूसरे पायदान पर पहुँच चुके थे, और एक लाख के करीब नये मामले आने का रिकॉर्ड भी बना चुके थे, उसके बवजूद हमारे देश के सत्ताजीवियों को सत्ता की चिन्ता सता रही थी, ये कोई पहली घटना नही थी सता के खातिर तो कोरोना पर नियंत्रण की वजाय सत्ताजीवी सत्ता पाने की खातिर नेताओं पर नियंत्रण बनाने पर लगे थे, जब कोरोना देश में पैर पसार रहा था !

इससे ही इनकी संजीदगी का एहशास किया जा सकता है कि ये देश और देश की जनता के प्रति कितना गंभीर हैं ? और इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि ये देश और देश की जनता के प्रति कितना समर्पण भाव रखते हैं, इन्हे दर्द तो होता है पर आपके दुख: या गम पर नहीं बल्कि सत्ता न मिल पाने का, ये आंसू तो बहाते हैं पर आपके अपनों की क्षति पर नही सत्ता हाथ से निकल जाने पर, और जो आंसू आपको दिखते भी हैं वो घडियाली होते हैं।

यदि नहीं तो जब हुजूर को केरोना काल के दौरान प्रवासी मजदूरों को लेकर माथे / पेसानियों पर बल पड़ रहा था तो प्रवासियों को उनके घर तक पहुँचाने का सुझाव किसने सुझाया, चापलूसों ने या चाटुकारों ने ? आखिर मेरे ही सुझाव पर शत् प्रतिशत विश्वास करना पड़ा था या नहीं ? क्या ये उसे झुठला सकते है ?

इस लिंक पर क्लिक करके दस माह पूर्व हुज़ूर के बाद सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेते हुये जनहित याचिका के तौर पर सुनवायी के लिये पत्र को द्रारा ई-मेल भेजा गया लेकिन इस पत्र को कितना संजीदगी से सुप्रीम कोर्ट ने लिया ये सुप्रीम कोर्ट को ही पता होगा !

यदि नहीं तो जब लॉकडाऊन को अनलॉक करके की बात हो रही थी तो उसका विरोध करते हुये मैंने हुजूर को सुझाव नहीं भेजा था ? जब एक सुझाव शत् प्रतिशत सफल हुआ जिसके माध्यम से विदेशों से भी प्रवासियों को देश लाया गया, इतना ही नहीं कृषि क्षेत्र में भी मनरेगा आदि के माध्यम से लाभ लेने के क्या सुझाव कारगर सावित नहीं हुये ? उस पर अपनी पीठ किसने थपथपाई मैंने या सरकार ने ?

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क्या मुझे सुझाव देने के एवज में किसी सरकार ने सराहा ? या कोई लाभ दिया ? नही ! लेकिन अफशोस कि हर राजनेता सिर्फ बस सिर्फ राजनेता होता है, कोई बात नहीं यदि मैं किसी भी प्रकार से देश के काम आया यही मेरे लिये काफी है।

लेकिन अफशोस तो तब होता है जब सिर्फ राजनीतिक लाभ हानि और स्वःहित के चलते देश और देश की जनता के प्राणों की भी बलि चढ़ा दी जाय ! यदि ऐसा नहीं है तो हुजूर ही खुद बतायें कि जब दस माह पूर्व सुझाव में साफ-साफ उल्लेख किया गया कि कोरोना पर चंद गिने चुने एक दो व्यक्ति के द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता न ही इसे आपदा प्रबंधन के भरोसे ही क्रियान्वित ही किया जाना उचित है, ये विशेष प्रकार की आपदा है इसे विशेष आपदा प्रबंधन के माध्यम से ही संचालित किया जाना चाहिये, जिसमें एक विशेष सिफारिश की गयी थी कि यह समिति राजनीति से प्रेरित न हो अर्थात इसका अध्यक्ष व इस समिति में किसी भी राजनेता का समावेश श्रेयकर नहीं होगा।

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जिसका असर अब इस कोरोना के दूसरे वेब में देखने को भी मिला है सारे के सारे राजनेता राजनीतिक बयान बाजी में अमादा हैं देश विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है, ये सब राजनीति में अव्वल बनने की रेस में हैं । यदि उस सुझाव पर अमल किया गया होता तो क्या आज ऑक्सीजन या रेमडेसिविर की किल्लत का सामना करना पड़ रहा होता ? क्या आज जो काला बाजारी चालू है वो हो पाती, लोग हजारों की संख्यां में मौत के मुँह में समाये जा रहे हैं ये सब नियंत्रित नहीं होता, यदि पूर्व में इस पर व्यवस्था की गयी होती ? जो कि सुझाव का हिस्सा था !

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इतना ही नहीं सुझाव में साफ – साफ ये सुझाया गया था कि बिना लॉकडाऊन हटाये देश की चरमराई अर्थ व्यवस्था को वापस गति प्रदान की जा सकती है, रोजगार, व्यापार, श्रमिकों, हाट-बाजार भी नीतिगत तरीके से खोले जा सकते हैं, इसके लिये केन्द्र के साथ महाराष्ट्र सरकार से भी आग्रह किया गया क्योंकि मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है यदि ये पटरी पर आ गयी तो इसकी देखा – देखी अन्य सरकारें भी हो सकता है अमल करें ! लेकिन सरकार तो सरकार होती है उसे जनता नहीं खुद से सरोकार होता है अन्यथा सबसे विषम परिस्थिति महाराष्ट्र की ही है चाहे नये केस को लेकर हो या फिर डेथ रेट को लेकर सब में अव्वल है। उसने प्रवासी मजदूर के सुझाव पर तो अमल किया लेकिन इस सुझाव पर क्योंकर अभी तक अमल नहीं किया ये उसे ही पता, क्योंकि इसके लिये राजनीति से उठकर, सामाजिक व जनभावना की जरूरत है अन्यथा सब ‘ढाक के तीन पात” के समान है।

अफशोस देश आज राज नेताओं के मकड़ जाल मे उलझ कर रहा गया है, इसमें अकेले राजनेता ही दोषी नहीं है हमारे देश के सिस्टम में ही दोष है, इतना ही नहीं आज देश को सबसे ज्यादा खतरा है तो उन बिकाऊ लोगों से जो अपनी सहुलियत और स्वार्थ के खातिर बिकते हैं, ये भी सोलह आने सच है कि बिकाऊ कभी भी टिकाऊ नहीं होता, वो वक्त की नज़ाकत को देख कर अपना मोल भाव करता है, वक्त के साथ – साथ वो भी पाला बदल लेता है !

लेकिन अफशोस तो इस बात का भी है कि हम चंन्द रुपयों के खातिर खुद के ईमान को बेच देते हैं, दो – चार सौ रुपये के खातिर हम राजनेताओं की रैलियों के भीड़ का हिस्सा भी बनना पसन्द करते हैं क्यों ? यही रखीदी हुई भीड़ का लाभ ही तो उठाते हैं ये सत्ताजीवी, जिसमें अहम रोल होता है कुछ उन बिकाऊ मीडिया का जो चन्द रुपयों के खातिर इन राजनेताओं के लिये वोटों में इजाफा करने में विशेष भूमिका निभाती है। जब करोड़ों रुपये खर्च करके राजनेता सत्ता का स्वाद चखते हैं तो क्या आप उनसे ये उम्मीद करते हैं कि वो आपके काम करेगें, जिसका मूल्य वो चुका कर सत्ता पर काबिज हुये हैं। तो सायद नही ?

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ऐसे ही नेता जो आपदा में अवसर को तलासते हैं, उनकी एक मात्र यही इच्छा होती है कि प्रभु करोड़ों खर्च करके और आपको चढ़ावा चढ़ा करके सत्ता तक तो पहुँच गया लेकिन प्रभु अब कृपा करो कि कम से कम अब आपदा में अवसर तो तलासने को मिले ताकि सात पीढ़ी के लिये जीवकोपार्जन की व्यवस्था हो सके !

हाँ यदि वाकई में सरकारें अपनी जगह नेक नियत से कार्य कर रहीं हैं और देश का मीडिया वाकई में जनहित में काम कर रहा है तो इस मुद्दे पर वो सरकार से व जिम्मेदार संस्थानों से सवाल करे कि कौन सी वजह थी कि इस सुझाव पर किसी का ध्यान केन्द्रित नहीं हो पाया ? या इससे बेहतर कौन से उपाय किये गये जो इस दूसरी लहर को तत्काल काबू में लाये जा सके ? टेस्टिंग पर क्योंकर ध्यान नहीं देना उचित समझा गया जब प्रधानमंत्री खुद कहते नजर आये कि ज्यादा टेस्टिंग से ही कोरोना पर काबू पाया जा सकता है ? क्या ऐसे अनगिनत सवालों का जवाब सरकार देना उचित नहीं समझती है या उसे देना नही चाहिये ? क्या देश और जनता से बड़ी सत्ता होती है ? क्या देश के नागरिकों की जान कीड़े मकौड़े के समान है, क्या संवैधानिक संस्थानों को संविधान में इसी लिये सशक्त अधिकार प्रदान किये गये ? (लिंक के माध्यम से भेजे गये पत्रों को भी प्रस्तुत किया गया है आप स्व:त सुझावों की सत्यता को जांचे और कमेंट बॉक्स के माध्यम से अपने विचार अवश्य व्यक्त करें)

अब सवाल यह है कि मोदी का भविष्य क्या होगा ?

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब कोरोना वायरस को पराजित करने का एलान किया और चुनावी गतिविधियों में व्यस्त हो गए, उसके लगभग तीन महीने बाद भारत में कोरोना वायरस की महामारी की जो भयानक लहर शुरू हुई उसने भारत को पूरी दुनिया में कोरोना का हाट स्पाट बना दिया।

वर्ष 2019 के आख़िरी महीनों में जब कोरोना वायरस की महामारी शुरू हुई तो नरेन्द्र मोदी ने इसको ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया। उस समय मोदी मध्य प्रदेश में कांग्रेस की राज्य सरकार गिराने में व्यस्त थे। 24 मार्च 2020 तक मोदी ने कोई ठोस क़दम नहीं उठाया। फिर जब इस तारीख़ को लाक डाउन लगाया तो वह दुनिया का बेहद त्रासदीपूर्ण लाकडाउन बन गया। इससे भारत की अर्थ व्यवस्था जो पहले ही चरमरा गई थी, बुरी तरह ढह गई। करोड़ों की संख्या में मज़दूर अचानक रोज़गार से वंचित हो गए।

देश में महामारी फैल रही थी मगर मोदी ने अमरीकी राष्ट्रपति को भारत के दौरे पर बुलाया। ट्रम्प अपने लाव लशकर के साथ भारत पहुंचे। उस समय कोरोना वायरस अमरीका में बुरी तरह फैल रहा था मगर ट्रम्प भी मोदी की तरह इस महामारी को गंभीरता से लेने के लिए तैयार नहीं थे।

जब अचानक लाकडाउन से हालात ख़राब हो गए तो मोदी सरकार ने कहा कि वह अस्पतालों में बेड की संख्या बढ़ाने और फ़ील्ड हास्पिटल बनाने जैसे बड़े क़दम उठा रही है। मोदी सरकार ने कोरोना वायरस से अर्थ व्यवस्था को पहुंचने वाले नुक़सान की भरपाई के लिए बड़े बड़े बजट का एलान भी किया।

नरेन्द्र मोदी ने देश के पांच राज्यों में तब चुनाव करवाए जब कोरोना के संक्रमण में गिरावट आने के बाद दोबारा तेज़ी आ रही थी। मोदी चुनाव का एलान कराने के बाद मैदान में कूद पड़े और उनके साथ उनकी पूरी सरकार बंगाल के गांव गांव शहर शहर भटकने और चुनाव प्रचार करने लगी।

मोदी की आख़िरी चुनावी सभा 17 अप्रैल को हुई जिस दिन भारत में कोरोना के 2.34 लाख से अधिक नए मामले आए थे और 1348 लोगों की मौत हुई थी।

इसके बाद मोदी ने सभा को आनलाइन संबोधित किया। इसके लिए पश्चिमी बंगाल में 200 से अधिक जगहों पर बड़े बड़े स्क्रीन लगाए गए थे।

भारत सरकार ने इसके साथ ही कुंभ मेला भी करवाया। मेले से लौटने वाले लोग अपने साथ कोरोना वायरस लेकर गए।

इस समय भारत के अस्पतालों में बेड और आक्सीजन की भारी कमी है और अस्पताल मरीज़ों से भरे हुए हैं। मंगलवार की शाम तक भारत में कोरोना से संक्रमित बीमारों की संख्या दो करोड़ से अधिक हो चुकी थी।

मोदी के आलोचकों का कहना है कि सरकार ने आक्सीजन और वैक्सीन की सप्लाई में भारी कोताही की जिसके नतीजे में हालात क़ाबू से बाहर निकल गए।

यह हालत हो जाने के बाद मोदी के ख़िलाफ़ आलोचना की लहर देश के भीतर और विश्व स्तर पर उठने लगी। मोदी के मीम और कार्टून बनाए जाने लगे, मोदी को सत्ता से हटाने की मांग उठने लगी। एक रात के भीतर इंटरनेट पर मोदी के इस्तीफ़े के लिए चलाए जाने वाले कैंपेन में 4 लाख से अधिक लोगों ने हस्ताक्षर किए।

हालिया समय तक कोई भी मोदी की खुलकर आलोचना करने की हिम्मत नहीं कर पाता था। क्योंकि एसा करने वाले के ख़िलाफ़ तत्काल क़ानूनी कार्यवाही हो जाती थी।

आलोचना के साथ ही मोदी की पार्टी को बंगाल में भारी हार का भी सामना करना पड़ा। मोदी ने चुनाव में हर संसाधन इस्तेमाल किया मगर उनकी पार्टी बुरी तरह हारी। अलबत्ता यह भी सच्चाई है कि भाजपा को लगभग 80 सीटें मिल गई हैं।

(सौ. पी.टी)

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