अनुमान या नैतिक मूल्यांकन पर नहीं हो सकती सजा, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और अतुल एस. चंद्रकुर की पीठ का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा काट रहे एक व्यक्ति को बरी कर दिया है। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी आचरण या कृत्य का केवल अनैतिक अथवा सामाजिक रूप से अनुचित होना अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का विधिक आधार नहीं बन सकता। अदालत ने रेखांकित किया कि आपराधिक न्यायशास्त्र के तहत किसी भी गंभीर आरोप को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष के पास ठोस, विश्वसनीय और निर्णायक साक्ष्य होना अनिवार्य है।
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंद्रकुर की दो सदस्यीय पीठ ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद निचली अदालत और उच्च न्यायालय के सजा के आदेश को निरस्त कर दिया। पीठ ने कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में अदालत का फैसला व्यक्तिगत अनुमानों, धारणाओं या नैतिक मूल्यांकन के आधार पर तय नहीं किया जा सकता, बल्कि वह पूरी तरह से रिकॉर्ड पर मौजूद वैधानिक और दस्तावेजी साक्ष्यों की कसौटी पर आधारित होना चाहिए। साक्ष्यों के अभाव में केवल सामाजिक अस्वीकार्यता के आधार पर सजा सुनाना न्यायसंगत नहीं है।
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह संदेह से परे जाकर अपराध को सिद्ध करे। यदि अभियोजन पक्ष ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश करने में विफल रहता है, तो आरोपी को इसका सीधा लाभ (बेनिफिट ऑफ डाउट) मिलना चाहिए। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि नैतिकता और कानून के बीच एक स्पष्ट अंतर रेखा होती है, जिसे न्यायिक निर्णयों के दौरान धुंधला नहीं होने दिया जा सकता।

