सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को विधानसभा से पारित विधेयकों पर सहमति रोकने को लेकर तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि की लंबे समय तक चुप्पी पर सवाल उठाया। साथ ही कोर्ट ने यह भी आश्चर्य जताया कि राज्यपाल विधानसभा से पुनः पारित विधेयकों को राष्ट्रपति के पास कैसे भेज सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इस मामले में तमिलनाडु सरकार की ओर से राज्यपाल के खिलाफ दायर रिट याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया।
पीठ ने कहा,
“राज्यपाल एक या दो साल तक चुप रहते हैं। सहमति नहीं देते। फिर अचानक कहते हैं कि मैंने इन्हें राष्ट्रपति के पास भेज दिया है। जब राज्य सरकार ने विधेयकों को पुनः पारित किया, तो राज्यपाल ने कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के पास भेज दिया, जबकि इससे पहले वे इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे।”
विधेयकों पर राज्यपाल की देरी
तमिलनाडु सरकार के अनुसार, राज्यपाल ने 12 विधेयकों पर अपनी सहमति नहीं दी, जिनमें से कुछ जनवरी 2020 से लंबित हैं। जब सरकार ने विशेष सत्र बुलाकर इन्हें फिर से पारित किया, तो राज्यपाल ने कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति को भेज दिया।
राज्यपाल की आपत्तियां और सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
देश के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, जो राज्यपाल की ओर से पेश हुए, ने दलील दी कि राज्यपाल ने राज्य सरकार को पहले ही विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति से जुड़े विधेयक पर अपनी आपत्तियों से अवगत कराया था।
राज्यपाल ने मांग की थी कि विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में उनकी भूमिका बरकरार रहे और खोज-सह-चयन समिति में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के अध्यक्ष के नामित व्यक्ति को शामिल किया जाए। लेकिन राज्य विधेयकों में राज्यपाल को इस नियुक्ति प्रक्रिया से हटाने की मांग की गई थी।
इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सवाल किया,
“तो फिर आप विधेयकों के बारे में चुप क्यों रहे? यदि आपको आपत्तियां थीं, तो आपने राज्य सरकार को पहले ही क्यों नहीं बताया? वे संभवतः आपसे सहमत होते।”
निष्कर्ष
चार दिनों तक चली लंबी बहस के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब अदालत के फैसले पर सबकी निगाहें टिकी हैं कि वह राज्यपाल की भूमिका और विधेयकों को रोकने की उनकी संवैधानिक शक्ति पर क्या निर्णय लेती है।

