अमेरिकी कांग्रेस की रिपोर्ट (सीईसीसी) में तिब्बत में चीन की सरकार की तरफ से किए जा रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन का खुलासा हुआ है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि तिब्बत की धार्मिक, सांस्कृतिक और जातीय स्वतंत्रता पर सख्त प्रतिबंध लगाए गए हैं। इसमें विशेष रूप से तिब्बती बौद्ध धर्म, राजनीतिक दमन और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका का जिक्र किया गया है, जो चीन की इस दमनकारी नीति को बढ़ावा दे रही हैं।
अमेरिकी कांग्रेस रिपोर्ट में बताया गया कि तिब्बत और अन्य तिब्बती इलाकों में धार्मिक गतिविधियों पर सख्त प्रतिबंध लगाए गए हैं। तिब्बती बौद्ध धर्म के अनुयायियों को धार्मिक आयोजन करने और मठों में जाने से रोका जा रहा है। बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान इन प्रतिबंधों को और बढ़ा दिया जाता है।
चीन ने तिब्बती धर्म को खत्म करने और इसे अपने ‘सिनीसाइजेशन’ (चीनीकरण) नीति के तहत बदलने की कोशिश की है। इसके तहत पारंपरिक तिब्बती संस्कृति और धर्म को सरकारी नियंत्रण वाले रूप में ढालने की कोशिश की जा रही है। इसमें मठों के भिक्षुओं को जबरन हटाया जा रहा है, जैसे ड्रगकर (शिन्हाई) काउंटी के अत्शोग मठ के भिक्षुओं को हटा दिया गया क्योंकि वहां पनबिजली प्रोजेक्ट बनाने की योजना है। इसके अलावा, चीन ने तिब्बती बच्चों के लिए बोर्डिंग स्कूल बनाए हैं, जहां उनकी संस्कृति और भाषा को खत्म करने की कोशिश की जा रही है।
राजनीतिक कैद और दमन
रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के राजनीतिक दमन में तिब्बती लोग अनुपातहीन (अनुपात से अधिक) रूप से निशाना बनाए जा रहे हैं। सीईसीसी के आंकड़ों के अनुसार, 2,764 राजनीतिक कैदियों में से 1,686 ऐसे लोग हैं, जो अपनी धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान के कारण जेल में हैं। इनमें से 678 कैदी तिब्बती बौद्ध धर्म से जुड़े हुए हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 1,693 राजनीतिक कैदियों में से 790 तिब्बती हैं, जो यह दर्शाता है कि चीन तिब्बती लोगों की जातीय और सांस्कृतिक पहचान को दबाने का प्रयास कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका
रिपोर्ट में अमेरिकी और विदेशी कंपनियों की भी आलोचना की गई है, जिनकी तकनीकें चीन द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन में उपयोग की जा रही हैं। थर्मो फिशर साइंटिफिक नाम की कंपनी के डीएनए सीक्वेंसर्स का इस्तेमाल चीन ने तिब्बत और शिनजियांग में तिब्बती और उइगर लोगों के डीएनए डेटाबेस बनाने के लिए किया। इस तकनीक के जरिए ऑर्गन हार्वेस्टिंग (अंग निकालने) जैसी आपत्तिजनक गतिविधियों में भी इस्तेमाल की आशंका जताई गई है।
तिब्बती भाषा और पर्यावरण पर हमले
चीन ने तिब्बती भाषा को खत्म करने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किए हैं। तिब्बत के लिए अब ‘ज़िज़ांग’ (तिब्बत का मंदारिन नाम) का उपयोग बढ़ाया जा रहा है, जिससे तिब्बत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को मिटाने का प्रयास हो रहा है। इसके अलावा, चीन की पनबिजली परियोजनाओं के कारण तिब्बत के कई ऐतिहासिक मठ और गांवों को डूबाने की योजना है। फरवरी 2024 में डेर्गे काउंटी में एक बड़े पनबिजली बांध के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। इस बांध से 13वीं सदी के प्रसिद्ध वंटो मठ समेत कई सांस्कृतिक धरोहरों के डूबने का खतरा है। ये रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील करती है कि तिब्बत की अनूठी सांस्कृतिक धरोहर और इसके लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए तुरंत कदम उठाए जाएं।

