नई दिल्ली: देश के पुलिस थानों में पारदर्शिता और मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया गया कि अधिकांश राज्य और केंद्र शासित प्रदेश (UTs) थानों में CCTV कैमरे लगाने के कार्य को तेजी से पूरा कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच की सुनवाई
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने ‘सुओ मोटो’ (स्वतः संज्ञान) याचिका पर सुनवाई करते हुए इस प्रक्रिया पर संतोष व्यक्त किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार उन राज्यों की फंडिंग (वित्तीय सहायता) संबंधी मांगों पर सकारात्मक रूप से विचार करेगी, जिन्होंने कैमरों की स्थापना के लिए अतिरिक्त बजट की मांग की है।
अमिकी क्यूरी की रिपोर्ट और अगली बैठक
अदालत की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता और अमिकी क्यूरी सिद्धार्थ दवे ने कोर्ट को बताया:
- समीक्षा बैठक: 28 अप्रैल के आदेश के बाद, 6 मई को केंद्र और सभी राज्यों के प्रतिनिधियों के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी।
- प्रगति रिपोर्ट: अधिकांश राज्यों ने इस दिशा में काफी काम पूरा कर लिया है, हालांकि कुछ ने तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से अतिरिक्त फंड की आवश्यकता जताई है।
- भविष्य की योजना: लंबित तकनीकी मुद्दों को सुलझाने के लिए जून या जुलाई में एक और उच्च स्तरीय बैठक प्रस्तावित है।
CCTV सिस्टम के लिए अनिवार्य मानक
सुप्रीम कोर्ट ने थानों में लगने वाले CCTV सिस्टम के लिए कड़े दिशा-निर्देश तय किए हैं:
- कवरेज: थानों के सभी एंट्री-एग्जिट पॉइंट, लॉकअप, कॉरिडोर, लॉबी और रिसेप्शन एरिया अनिवार्य रूप से कवर होने चाहिए।
- तकनीक: कैमरों में नाइट विजन (अंधेरे में देखने की क्षमता) और ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की सुविधा होना आवश्यक है।
- डेटा स्टोरेज: रिकॉर्ड किए गए फुटेज का बैकअप कम से कम एक साल तक सुरक्षित रखना अनिवार्य होगा।
मामले का बैकग्राउंड
सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में पहली बार मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए थानों में CCTV लगाने का आदेश दिया था। इसके बाद दिसंबर 2020 में अदालत ने अपने आदेश का दायरा बढ़ाते हुए सीबीआई (CBI), ईडी (ED) और एनआईए (NIA) जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों के कार्यालयों में भी कैमरे लगाना अनिवार्य कर दिया था।

