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Wednesday, June 17, 2026

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गर्मागर्म समोसे के साथ शरीर में जा रहा है ‘धीमा जहर’: जानें क्यों अखबार में खाना लपेटना सेहत के लिए है बेहद खतरनाक; FSSAI की सख्त चेतावनी

मुंबई/नई दिल्ली: भारत के अमूमन हर शहर या कस्बे में सुबह-शाम रेहड़ियों और दुकानों पर गर्मागर्म समोसे, कचौड़ी, भटूरे, पकौड़े और जलेबी तलते हुए देखना बेहद आम बात है। इन तेलयुक्त और लजीज पकवानों को खरीदते समय अक्सर दुकानदार इन्हें तुरंत अखबार (Newspaper) में लपेटकर या सीधे अखबार के पन्नों पर रखकर आपको परोस देते हैं। अधिकांश लोग इसे एक सामान्य और पारंपरिक आदत मानते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस अखबार को आप चाव से पढ़ते हैं, उसी में लिपटा हुआ खाना आपके शरीर के भीतर ‘धीमे जहर’ (Slow Poison) की तरह काम कर रहा है?

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के पश्चिमी क्षेत्रीय कार्यालय ने देश के सभी खाद्य कारोबार संचालकों (FBOs) को एक कड़ा विधिक निर्देश जारी किया है। प्राधिकरण ने साफ किया है कि खाद्य पदार्थों को पैक करने या परोसने के लिए अखबार का उपयोग करना केवल एक अस्वच्छ आदत नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा नियमों का गंभीर उल्लंघन है।

क्यों अचानक चर्चा में आया यह संवेदनशील मुद्दा?

हाल ही में देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में एक वड़ा पाव विक्रेता के खिलाफ एफएसएसएआई और बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने संयुक्त रूप से एक बड़ी दंडात्मक कार्रवाई की। यह वड़ा पाव विक्रेता ग्राहकों को सीधे अखबार के पन्नों में खाना लपेटकर बेच रहा था। इस घटना के बाद खाद्य सुरक्षा नियामक ने एक बार फिर से देश भर में यह स्पष्ट कर दिया है कि व्यापारिक स्तर पर अखबार में खाना पैक करना या परोसना पूरी तरह से प्रतिबंधित (Banned) है।

एफएसएसएआई के अनुसार, अखबारों की छपाई में इस्तेमाल होने वाली आधुनिक स्याही (Ink) में अत्यधिक हानिकारक रसायन होते हैं। इसके अलावा, छपने के बाद वेंडरों और घरों तक वितरण (Distribution) के दौरान अखबार कई अस्वच्छ हाथों और धूल-मिट्टी से होकर गुजरते हैं, जिससे उनमें बैक्टीरिया और अन्य गंभीर रोगजनक (Pathogens) तत्व चिपक जाते हैं।

गर्म और तैलीय खाना रसायनों को सोखने की प्रक्रिया करता है $2\times$ तेज

अधिकांश लोगों को लगता है कि अखबार सिर्फ एक सामान्य कागज है, तो भला इससे क्या नुकसान होगा? लेकिन विधिक और वैज्ञानिक रूप से असली समस्या कागज नहीं, बल्कि उसकी छपाई में इस्तेमाल होने वाली केमिकल युक्त स्याही है। जब समोसा, कचौड़ी या जलेबी जैसी अत्यधिक गर्म और तेलयुक्त (Oily) चीजें अखबार के सीधे संपर्क में आती हैं, तो भोजन का गर्म तापमान और तेल उस स्याही को तुरंत पिघलाकर भोजन के भीतर अवशोषित (Absorb) कर लेते हैं। इसका मतलब है कि भोजन के साथ-साथ वह जहरीली स्याही भी सीधे आपके पेट में चली जाती है।

अखबार की स्याही में मौजूद ‘साइलेंट किलर’ रसायन और उनके खतरे

वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, अखबार की छपाई के लिए इस्तेमाल होने वाले रंगों, पिगमेंट्स और बाइंडर्स में कई प्रकार के भारी धातु (Heavy Metals) और जहरीले तत्व शामिल होते हैं। नीचे दी गई तालिका में इनके प्रकार और स्वास्थ्य पर होने वाले दुष्प्रभावों को समझा जा सकता है:

रासायनिक तत्व / भारी धातुशरीर पर होने वाला गंभीर दुष्प्रभाव (Health Risks)
लेड (Lead / सीसा)यह एक अत्यंत घातक भारी धातु है जो शरीर के अंगों में जमा होकर सीधे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (Nervous System), किडनी और मस्तिष्क को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है।
कैडमियम (Cadmium)लंबे समय तक इसके संदूषण (Contamination) के संपर्क में रहने से इंसानी हड्डियां बेहद कमजोर हो जाती हैं और किडनी फेलियर का खतरा बढ़ता है।
क्रिस्टलीय क्रोमियम (Chromium)शरीर के भीतर जाकर यह पाचन तंत्र में अल्सर और आंतरिक कोशिकाओं को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
मिनरल ऑयल (Mineral Oils)स्याही को तरल बनाने वाले ये खनिज तेल भोजन को विषाक्त (Toxic) कर देते हैं, जिससे लीवर से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं।
वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs)हवा और गर्मी के संपर्क में आकर ये रासायनिक वाष्प कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण बन सकते हैं।

क्या कहता है FSSAI का कानून?

खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग) विनियमों के विधिक प्रावधानों के अनुसार, अखबारों या रीसाइकिल्ड (पुनर्चक्रित) कागजों का उपयोग खाने-पीने की वस्तुओं को रखने, छानने या पैक करने के लिए करना कानूनी रूप से पूरी तरह वर्जित है। नियमों का उल्लंघन करने वाले दुकानदारों, रेस्तरां मालिकों और स्ट्रीट वेंडर्स पर भारी जुर्माना लगाने और उनका खाद्य लाइसेंस रद्द करने तक का प्रावधान है।

एफएसएसएआई ने आम जनता से भी यह पुरजोर अपील की है कि वे अपनी सेहत के प्रति जागरूक बनें। यदि कोई दुकानदार आपको अखबार में खाना परोसता है, तो उसे तुरंत टोकें और भोजन के लिए केवल फूड-ग्रेड कंटेनर्स, बटर पेपर, या पारंपरिक पत्तलों (जैसे केले या साल के पत्ते) के उपयोग को ही बढ़ावा दें।

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