28.1 C
Mumbai
Saturday, August 1, 2026

आपका भरोसा ही, हमारी विश्वसनीयता !

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ECI और राज्य सरकार से मांगा जवाब

33.5 लाख लंबित अपीलों और 58 लाख नाम हटाए जाने का मामला; कोर्ट ने कहा—’नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का अधिकार नहीं’

नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए लोगों के दावों, आपत्तियों और विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ों को सार्वजनिक करने की मांग वाली जनहित याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई की। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में भारत निर्वाचन आयोग (ECI), पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

यह याचिका पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस समिति की एसआईआर समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण और वकील नेहा राठी के जरिए दायर की गई है।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी: ‘ECI का अधिकार केवल मतदाता सूची तक’

सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने बिहार SIR मामले के अपने पुराने फैसले का हवाला देते हुए स्थिति स्पष्ट की:

  • नागरिकता का अधिकार: पीठ ने कहा कि यदि कोई न्यायाधिकरण किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल करने से मना करता है, तो निर्वाचन आयोग का दायित्व केवल इतना है कि वह मामला नागरिकता तय करने के लिए केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालय को भेजे।
  • संविधान की सीमाएं: कोर्ट ने साफ लहजे में कहा कि नागरिकता तय करना निर्वाचन आयोग का संवैधानिक अधिकार नहीं है। आयोग का अधिकार केवल मतदाता सूची की निगरानी और नियंत्रण तक ही सीमित है।

याचिकाकर्ता की प्रमुख दलीलें और आंकड़े

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने अदालत के समक्ष प्रक्रियागत अनियमितताओं और पारदर्शी आंकड़ों की कमी का मुद्दा उठाया:

  1. 58 लाख नाम हटाए गए: पुनरीक्षण के दौरान गणना चरण में 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए। नाम जोड़ने के लिए 9.64 लाख आवेदन मिले थे, लेकिन अंतिम सूची में केवल 1.82 लाख नाम ही जोड़े गए।
  2. 33.5 लाख अपीलें लंबित: गठित 18 अपीलीय न्यायाधिकरणों के पास 33.5 लाख से अधिक अपीलें अभी भी पेंडिंग हैं। जिन मामलों का निपटारा हुआ, उनमें 70% दावे स्वीकार किए गए हैं।
  3. सरकारी सुविधाओं से वंचित: मतदाता सूची से नाम हटने के कारण गरीब व अशिक्षित लोगों को राशन (PDS), ‘अन्नपूर्णा योजना’ और जाति प्रमाण पत्र जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित होना पड़ रहा है।
  4. ‘तार्किक विसंगति’ पर सवाल: करीब 60 लाख मामलों को माता-पिता व बच्चों की उम्र में अंतर या स्पेलिंग मिस्टेक जैसी ‘तार्किक विसंगतियों’ का हवाला देकर नोटिस भेजे गए, जिसका जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 में कोई आधार नहीं है।

क्या हैं याचिकाकर्ता की प्रमुख मांगें?

  • निर्वाचन आयोग फॉर्म-6 और फॉर्म-7 के तहत प्राप्त, स्वीकार किए गए और खारिज किए गए आवेदनों का विधानसभा क्षेत्रवार ब्योरा तुरंत सार्वजनिक करे।
  • 18 अपीलीय न्यायाधिकरणों की स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) और अपील प्रक्रिया से जुड़ी आसान गाइडलाइंस बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी में जारी की जाएं।
  • जब तक लंबित अपीलों पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक किसी भी नागरिक को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से बाहर न रखा जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं (जिसमें ममता बनर्जी की याचिका भी शामिल है) के साथ संलग्न कर दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी।

ताजा खबर - (Latest News)

Related news

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here