नई दिल्ली: देश की शीर्ष अदालत ने आपराधिक न्याय प्रणाली और जमानत के नियमों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत स्पष्ट किया है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (1 जुलाई 2026) को साफ कर दिया कि यदि जांच एजेंसी ने निर्धारित समय के भीतर अदालत में आरोप-पत्र (चार्जशीट) दाखिल कर दिया है, तो केवल आरोपी को उसकी प्रति (Copy) उपलब्ध न कराए जाने को ‘डिफॉल्ट जमानत’ (Default Bail) का विधिक आधार नहीं बनाया जा सकता है।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की विधिक पीठ ने इस संबंध में बॉम्बे हाईकोर्ट के पुराने आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा, जिसने आरोपी की ऐसी ही एक तकनीकी याचिका को विधिक रूप से खारिज कर दिया था।
1. बीएनएसएस (BNSS), 2023 के कानूनी प्रावधानों की व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के नए प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए इस विधिक स्थिति को स्पष्ट किया:
- धारा 193(3) बनाम 193(8): पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समयसीमा के भीतर बीएनएसएस की धारा 193(3) के तहत निर्धारित विधिक प्रारूप में चार्जशीट कोर्ट में पेश हो जाती है, तो आरोपी का डिफॉल्ट जमानत पाने का विधिक अधिकार स्वतः समाप्त हो जाता है।
- अतिरिक्त प्रतियां न होना तकनीकी चूक: न्यायालय ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 193(8) के तहत यदि चार्जशीट की अतिरिक्त प्रतियां (Additional Copies) जमा नहीं की गई हैं, तो इससे मूल चार्जशीट अवैध या अमान्य नहीं हो जाती।
- धारा 187(3) का सिद्धांत: पीठ ने अपने विधिक आदेश में रेखांकित किया कि धारा 193(8) के गैर-अनुपालन को धारा 187(3) (जो डिफॉल्ट जमानत के मूल विधिक अधिकारों को नियंत्रित करती है) के उल्लंघन के समतुल्य नहीं माना जा सकता।
2. ₹3.81 करोड़ की हाई-टेक साइबर ठगी का था मामला
यह पूरा विधिक विवाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा दर्ज एक बेहद संवेदनशील और बड़े वित्तीय अपराध से जुड़ा हुआ है:
मामले की विधिक पृष्ठभूमि कथित घोटाला राशि:कार्यप्रणाली (Modus Operandi):बैंक अधिकारियों की संलिप्तता:यह पूरा आपराधिक मुकदमा लगभग 3.81 करोड़ की साइबर धोखाधड़ी से संबंधित है।साइबर अपराधियों ने अत्याधुनिक डिजिटल टूल्स, फर्जी पहचान और जाली विधिक दस्तावेजों का उपयोग किया।सीबीआई का आरोप है कि ठगी की रकम को खपाने के लिए कुछ बैंक अधिकारियों ने अपराधियों की विधिक मदद की।
3. बॉम्बे हाईकोर्ट के विधिक रुख पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर
आरोपी ने बॉम्बे हाईकोर्ट में दलील दी थी कि भले ही सीबीआई ने तय समय के भीतर चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कर दी थी, लेकिन उसे उसकी विधिक प्रति समय पर हस्तगत नहीं कराई गई, जो उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को विधिक रूप से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि चार्जशीट दाखिल करना जांच एजेंसी की अदालत के प्रति विधिक जिम्मेदारी है। एक बार जब अदालत के रिकॉर्ड में चार्जशीट आ जाती है, तो आरोपी को उसकी प्रति मिलने में होने वाली प्रक्रियात्मक देरी को ‘जांच अधूरी रहने’ का प्रमाण नहीं माना जा सकता, और न ही इसके आधार पर अनिवार्य विधिक जमानत का लाभ दिया जा सकता है।

