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Sunday, June 14, 2026

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TMC में अब तक की सबसे बड़ी बगावत: 20 से अधिक लोकसभा सांसदों का विद्रोह, त्रिपुरा की पार्टी में किया विलय; दलबदल कानून से बचने की बड़ी रणनीति

नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सुलग रही आंतरिक कलह अब एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व राजनीतिक विभाजन (Split) में तब्दील हो गई है। टीएमसी के बागी सांसदों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुला विद्रोह करते हुए संसद के भीतर एक बहुत बड़ा राजनीतिक धमाका कर दिया है। दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की विधिक अड़चनों और अपनी लोकसभा सदस्यता खारिज होने के खतरे से बचने के लिए बागी गुट ने त्रिपुरा की ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी’ के साथ अपने गुट के पूर्ण विलय (Merger) का आधिकारिक एलान कर दिया है। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम ने दिल्ली से लेकर कोलकाता के राजनीतिक गलियारों में भारी भूकंप ला दिया है।

स्पीकर ओम बिरला के आवास पर हाई-प्रोफाइल पेशकश; अलग बैठने की मांग

इस ऐतिहासिक विलय की सार्वजनिक घोषणा से ठीक पहले रविवार (14 जून 2026) को टीएमसी के वरिष्ठ और कद्दावर बागी सांसदों— काकोली घोष दस्तीदार, सुदीप बंदोपाध्याय और शताब्दी रॉय ने लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) ओम बिरला से उनके आधिकारिक आवास पर मुलाकात की। इन सांसदों ने लोकसभा के भीतर तत्काल प्रभाव से खुद के लिए और अपने साथी सांसदों के लिए तृणमूल कांग्रेस से अलग बैठने की व्यवस्था (Separate Seating Arrangement) करने की औपचारिक व लिखित मांग की है।

बागी गुट के नेताओं ने दावा किया है कि टीएमसी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 20 से 22 सांसद उनके इस विद्रोही कदम के साथ पूरी निष्ठा से खड़े हैं। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष से तकनीकी और विधिक आधार पर अपील की है कि संसद के भीतर उनके गुट को ही ‘असली टीएमसी विधायी दल’ (Real TMC Legislative Party) के रूप में मान्यता प्रदान की जाए।

स्पीकर से मिलने से पहले भूपेंद्र यादव के घर बनी थी गुप्त ‘स्क्रिप्ट’
राजनीतिक हलकों में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मिलने जाने से ठीक पहले इन सभी बागी टीएमसी सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पश्चिम बंगाल चुनाव प्रभारी और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के दिल्ली स्थित आवास पर जाकर एक लंबी और गोपनीय रणनीतिक बैठक की। इस हाई-प्रोफाइल बैठक में टीएमसी की युवा नेता सयानी घोष और वरिष्ठ सांसद माला रॉय भी प्रमुखता से शामिल थीं। इस बैठक के तुरंत बाद काकोली घोष दस्तीदार ने media से बात करते हुए साफ कहा, “हमने लोकसभा स्पीकर से सदन में हमारे लिए अलग बैठने की व्यवस्था करने का अनुरोध किया है, क्योंकि हम सभी औपचारिक रूप से नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी में अपना विलय कर चुके हैं।”

क्यों चुनी गई ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी’? क्या है इसके पीछे का कानूनी खेल?

‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी’ मुख्य रूप से पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा पर आधारित एक बेहद छोटी और क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी है। त्रिपुरा, असम और पश्चिम बंगाल के कुछ विशिष्ट सीमावर्ती इलाकों में इसकी मामूली सांगठनिक उपस्थिति जरूर है, लेकिन यह राष्ट्रीय स्तर की मुख्यधारा की राजनीति में बहुत कम चर्चित रही है।

टीएमसी के बागी चाणक्यों ने संविधान की 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के कड़े कानूनी प्रावधानों से पार पाने के लिए बहुत सोच-समझकर इस गुमनाम पार्टी को चुना है:

  • सांसदी बचाने का विधिक फॉर्मूला: संसद के नियमों के अनुसार, किसी भी दल के बागी सांसद सदन में सीधे तौर पर बिना किसी मूल राजनीतिक दल के कोई स्वतंत्र या अलग गुट बनाने का दावा नहीं कर सकते। यदि वे ऐसा करते हैं, तो उनकी संसद सदस्यता तुरंत निरस्त (Disqualify) हो जाती है।
  • विलय की अनिवार्यता: दलबदल विरोधी कानून से बचने का एकमात्र विधिक रास्ता यही है कि कुल संख्या बल का दो-तिहाई ($2/3$) हिस्सा किसी अन्य पंजीकृत दल में अपना पूर्ण विलय कर ले। इस तकनीकी आवश्यकता को पूरा करने के बाद यह बागी गुट एक नए कानूनी ढांचे के तहत केंद्र की सत्ता में काबिज भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) गठबंधन को अपना बिना शर्त समर्थन सौंप देगा।

दीदी को ‘मार्गदर्शक’ बनाने की जिद; ममता बनर्जी कैंप का करारा पलटवार

विद्रोहियों के इस कुनबे में वरिष्ठ नेता सुदीप बंदोपाध्याय के खुलकर शामिल होने के बाद बगावत की धार और तेज हो गई है। बागी सांसद अब ममता बनर्जी को सक्रिय राजनीति से हटाकर पार्टी में केवल एक ‘मार्गदर्शक’ (Mentor) की भूमिका तक सीमित करने की जिद पर अड़े हैं।

जैसे ही इस भारी टूट की खबर दिल्ली और कोलकाता में फैली, ममता बनर्जी के वफादार खेमे ने भी अपनी जवाबी और आक्रामक कानूनी कार्रवाई तेज कर दी। टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने रविवार को ही कोलकाता से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक बेहद कड़ा और कानूनी तौर पर तैयार किया गया पत्र भेजा। ममता कैंप के भरोसेमंद सांसद कीर्ति आजाद और राज्यसभा सदस्य सागरिका घोष ने दिल्ली में बिना समय गंवाए व्यक्तिगत रूप से स्पीकर कार्यालय पहुंचकर यह पत्र सौंपा, जिसमें बागी सांसदों की सदस्यता तुरंत रद्द करने की मांग की गई है। सदन के भीतर अब एक बड़ी और लंबी कानूनी जंग छिड़ना पूरी तरह तय हो चुका है।

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