27.7 C
Mumbai
Sunday, July 26, 2026

आपका भरोसा ही, हमारी विश्वसनीयता !

संपादकीय- देर से लिया गया फैसला और लोकतंत्र में संवाद का महत्व, “हुज़ूर… आते-आते बहुत देर कर दी!”

सत्ता तभी झुकती है, जब उसे जनता की ताकत का एहसास हो जाता है, देश का युवा ही देश की असली ताकत है।

लेखक:
रवि जी. निगम
राष्ट्रीय अध्यक्ष – अखिल भारतीय श्रमिक पार्टी
संपादक – मानवाधिकार अभिव्यक्ति न्यूज़

लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संसद की भव्य इमारतों में नहीं, बल्कि सड़क पर खड़े उस नागरिक की आवाज़ में निहित होती है जो संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करता है। जब देश के भावी निर्माता—हमारे विद्यार्थी—अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए सड़कों पर उतरते हैं, तो उनका संघर्ष केवल उनका व्यक्तिगत आंदोलन नहीं रह जाता, बल्कि वह आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित और पारदर्शी भविष्य की बुनियाद बन जाता है। हाल ही में शिक्षा व्यवस्था में उभरे गंभीर विवादों के बाद छात्रों द्वारा चलाए गए ऐतिहासिक आंदोलन और अंततः सरकार द्वारा उनकी मांगों को स्वीकार किए जाने का घटनाक्रम इसी लोकतांत्रिक सत्य की पुनः पुष्टि करता है। मैं उन सभी छात्र-छात्राओं को बधाई देता हूँ जिन्होंने शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक संघर्ष के ज़रिए यह ऐतिहासिक जीत हासिल की है।

प्रशासनिक संवेदनहीनता, बर्बरता और समय पर सही निर्णय की आवश्यकता

छात्रों ने निष्पक्ष जांच, जवाबदेही तय करने, प्रभावितों को मुआवजा देने और आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमों को वापस लेने जैसी तीन स्पष्ट मांगें रखी थीं। यद्यपि सरकार ने शिक्षा मंत्री – धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार किया और मांगों पर सहमति जताई, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कार्यशैली और प्रशासनिक मंशा पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। प्रश्न यह उठता है कि यदि अंततः मांगों पर सहमत ही होना था, तो इस निर्णय में इतना लंबा विलंब क्यों किया गया? यदि शुरुआत में ही संवाद और संवेदनशीलता का परिचय दिया जाता, तो देशभर में फैला आक्रोश और शिक्षा प्रणाली पर उपजा गहरा अविश्वास समय रहते टल सकता था।

20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई की जितनी निंदा की जाए कम है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर बर्बरतापूर्वक बल प्रयोग किया गया। विशेषकर प्रदर्शनकारी छात्राओं के साथ पुलिस और प्रशासन द्वारा किया गया दुर्व्यवहार, अमानवीय व्यवहार और उनके प्राइवेट पार्ट्स पर हमला करने के जो अत्यंत गंभीर आरोप सामने आए हैं, वे न केवल शर्मनाक हैं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की सरेआम हत्या हैं। किसी भी सभ्य समाज में महिलाओं और छात्राओं के सम्मान तथा गरिमा से ऐसा खिलवाड़ कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मैं केंद्र सरकार एवं संबंधित प्रशासन से यह पुरज़ोर मांग करता हूँ कि संसद मार्च के दौरान हुए इस पुलिसिया अत्याचार और छात्राओं से बर्बरता के सभी मामलों की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। जो भी पुलिस अधिकारी या कर्मचारी शक्तियों के दुरुपयोग, अनावश्यक बल प्रयोग और महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुँचाने के इस कृत्य में संलिप्त पाए जाएं, उनके विरुद्ध बिना किसी ढिलाई के कठोरतम कानूनी और दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। वर्दी का सम्मान केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि जवाबदेही और मानवीय मर्यादाओं के पालन से सुरक्षित रहता है।

सरकारें केवल निर्णय लेने से नहीं, बल्कि सही समय पर और न्यायपूर्ण निर्णय लेने से विश्वास अर्जित करती हैं। अब समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था को तात्कालिक राजनीति से ऊपर उठाकर एक राष्ट्रीय दायित्व के रूप में देखा जाए, ताकि भविष्य में किसी विद्यार्थी को अपने मौलिक अधिकारों और पारदर्शी भविष्य के लिए सड़कों पर उतरने और पुलिस की लाठियां खाने के लिए मजबूर न होना पड़े।

ताजा खबर - (Latest News)

Related news

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here