प्राकृतिक न्याय की अनदेखी; दिल्ली HC के ‘हरि राजमणिक्कम’ फैसले के तहत कार्यवाही की मांग
नई दिल्ली/ठाणे: प्रस्तावित राजनीतिक दल “अखिल भारतीय श्रमिक पार्टी” के पंजीकरण आवेदन को बंद अथवा अस्वीकृत किए जाने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। पार्टी ने भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) की इस एकतरफा कार्यवाही पर कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए अधिवक्ता के माध्यम से एक औपचारिक ‘लीगल नोटिस-कम-फाइनल रिप्रेजेंटेशन’ भेजा है। पार्टी के अध्यक्ष एवं अधिकृत प्रतिनिधि रवि गोपाल निगम की ओर से प्रेषित इस कानूनी नोटिस में स्पष्ट कहा गया है कि आयोग ने बिना पक्ष सुने ही आवेदन को खारिज कर प्राकृतिक न्याय के मूलभूत सिद्धांतों की अनदेखी की है। पार्टी ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A(7) के तहत विधिवत सुनवाई की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि यदि आयोग ने न्यायसंगत कदम नहीं उठाया, तो वे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।
नोटिस में दिए गए विवरण के अनुसार, निर्वाचन आयोग द्वारा पूर्व में पार्टी के दस्तावेजों व शपथपत्रों (एफिडेविट्स) में कमियां बताए जाने पर पार्टी ने 12 सितंबर 2025 को ही विस्तृत उत्तर दाखिल कर दिया था। इसके साथ ही नए या संशोधित दस्तावेज जमा कराने की तत्परता जताते हुए संबंधित कमियों का स्पष्ट ब्योरा मांगा गया था। पार्टी का आरोप है कि इसके बाद 10 अप्रैल 2026 को आयोग का पत्र कथित रूप से गलत नाम व पते पर भेजा गया, जिससे वह समय पर नहीं मिला। यद्यपि पार्टी प्रतिनिधि ने 13 अप्रैल 2026 को निर्वाचन आयोग के नई दिल्ली स्थित कार्यालय में व्यक्तिगत उपस्थित होकर वस्तुस्थिति स्पष्ट करने का प्रयास किया, लेकिन 15 अप्रैल 2026 को बिना पर्याप्त अवसर और पूर्व सूचना के महज एक संक्षिप्त टेलीफोनिक बातचीत के आधार पर पंजीकरण आवेदन को बंद करने की प्रक्रिया अपना ली गई।
विधिक नोटिस में दिल्ली उच्च न्यायालय के चर्चित निर्णय ‘हरि राजमणिक्कम बनाम भारत निर्वाचन आयोग’ [W.P.(C) No. 1361/2026] का हवाला देते हुए कानूनी स्थिति रखी गई है। पार्टी का कहना है कि उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि यदि आयोग सत्यापन प्रक्रिया के दौरान किसी विसंगति या सामग्री पर निर्भर करता है, तो आवेदक दल को उसका समुचित स्पष्टीकरण देने के लिए संबंधित विशिष्ट विवरण (पार्टिकुलर्स) उपलब्ध कराना अनिवार्य है। श्रमिक पार्टी ने मांग की है कि आयोग कथित कमियों से जुड़ी सामग्री साझा करे, आवेदन व संशोधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराए और धारा 29A(7) के अनुरूप नए सिरे से प्रभावी व्यक्तिगत सुनवाई देकर एक तार्किक आदेश पारित करे। पार्टी ने दो टूक कहा है कि यदि निर्धारित समयावधि में सकारात्मक कार्यवाही नहीं हुई, तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल करना ही अंतिम विधिक विकल्प होगा।

