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Tuesday, October 6, 2026

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संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर का बड़ा बयान: ‘पुराने ढांचे में अटका है यूएन, सुधार ही एकमात्र समाधान’

रूस-यूक्रेन युद्ध और खाड़ी संकट का दिया हवाला; सुरक्षा परिषद में गतिरोध के चलते वैश्विक फैसलों में आ रही रुकावट

नई दिल्ली: भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की मौजूदा कार्यप्रणाली और उसकी संरचनात्मक सीमाओं पर बेहद तीखी और गंभीर टिप्पणी की है। उन्होंने वैश्विक मंच पर तत्काल सुधारों की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा कि दुनिया भर में उभरते बड़े संकटों और विवादों पर यह शीर्ष वैश्विक संस्था अब प्रभावी और ठोस निर्णय लेने में काफी हद तक विफल साबित हो रही है। जयशंकर ने जोर देकर कहा कि मौजूदा वैश्विक चुनौतियों का समाधान संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को दरकिनार करना या छोड़ना नहीं, बल्कि समय की मांग के अनुरूप इसमें व्यापक संरचनात्मक सुधार करना है।

राजधानी दिल्ली में आयोजित एक प्रतिष्ठित कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री ने रेखांकित किया कि पिछले साढ़े चार वर्षों से अधिक समय से खिंच रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष और खाड़ी देशों में बढ़ते टकराव के दौरान संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह गतिरोध में फंसा हुआ नजर आया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल हालिया युद्ध ही नहीं, बल्कि इससे पहले अफ्रीका के जटिल मुद्दों और सदी की सबसे बड़ी कोविड-19 महामारी के दौरान भी निर्णायक नीतियां बनाने में यूएन की भूमिका काफी हद तक निष्प्रभावी और अप्रासंगिक ही रही है।

विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के मौजूदा ढांचे पर सीधा प्रहार करते हुए कहा कि परिषद के भीतर जारी आपसी गतिरोध के कारण निर्णय लेने की संपूर्ण प्रक्रिया अपनी प्रभावशीलता खो चुकी है। उन्होंने कहा कि आज की सुरक्षा परिषद पूरी दुनिया के वास्तविक हितों और उभरते संतुलन का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती है। दुनिया आज पहले से कहीं अधिक स्मार्ट, आपस में जुड़ी हुई और बहुध्रुवीय बन चुकी है, लेकिन यूएन की निर्णय लेने वाली व्यवस्था अब भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौर के पुराने और संकीर्ण ढांचे में ही अटकी हुई है।

इस महत्वपूर्ण विचार-विमर्श सत्र के दौरान मंच पर सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज योंग बून येओ भी उपस्थित रहे। जयशंकर ने कहा कि जब तक सुरक्षा परिषद में विकासशील देशों और उभरती वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, तब तक यह संस्था 21वीं सदी की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं और सुरक्षा चुनौतियों का समाधान करने में सक्षम नहीं हो सकेगी।

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