राजस्थान हाईकोर्ट मामले पर संस्थागत प्रक्रिया पर जोर, न्यायपालिका में तकनीक की निगरानी के लिए बनेगा शीर्ष निकाय
नई दिल्ली: भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने न्यायपालिका में तकनीक के इस्तेमाल और आंतरिक प्रशासनिक शुचिता को लेकर दो टूक रुख साफ किया है। जर्मनी के कार्ल्सरूहे में संघीय न्यायालय के अध्यक्ष न्यायाधीश उलरिख हेरमन के साथ द्विपक्षीय बैठक के दौरान सीजेआई ने स्पष्ट किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) न्यायिक तर्क को सुगम और बेहतर बनाने में सहायता कर सकती है, लेकिन वह किसी न्यायाधीश के मानवीय विवेक का स्थान कभी नहीं ले सकती।
सीजेआई ने बताया कि न्यायपालिका में एआई के सुरक्षित इस्तेमाल और उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक स्थायी शीर्ष निकाय के गठन का प्रस्ताव विचाराधीन है।
‘फैसले तय नहीं कर सकती तकनीक’ सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि वर्तमान में एआई का उपयोग कानूनी शोध, 16 भाषाओं में फैसलों के अनुवाद और वादियों को केस स्टेटस की जानकारी देने जैसे दोहराव वाले सहायक कार्यों तक सीमित है। सुप्रीम कोर्ट की एआई समिति के मसौदा नियमों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि एआई को प्रशासनिक प्रबंधन, ट्रांसक्रिप्शन और केस लिस्टिंग तक ही अनुमति दी गई है। गवाह की विश्वसनीयता आंकने, जमानत पात्रता, फरार होने के जोखिम या अपराध की पुनरावृत्ति के आकलन जैसे संवेदनशील न्यायिक निर्णयों में एआई के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध है।
राजस्थान हाईकोर्ट विवाद पर संस्थागत निष्पक्षता की बात विदेशी दौरे के दौरान सीजेआई ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति संदीप मेहता द्वारा राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा के खिलाफ प्रशासनिक अनियमितताओं और केस लिस्टिंग में लगाए गए आरोपों पर भी प्रतिक्रिया दी। सीजेआई ने कहा कि किसी भी मौजूदा न्यायाधीश के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच केवल स्थापित संस्थागत तंत्र के माध्यम से निष्पक्षता से होनी चाहिए। केवल आरोपों को अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता और संबंधित न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा।

