90% विकलांगता वाली 6 महीने की बच्ची का मुआवजा बढ़ाकर किया 83.38 लाख रुपये; 100% कार्यात्मक विकलांगता मानी गई
नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने सड़क हादसों में गंभीर रूप से घायल बच्चों को मिलने वाले मुआवजे से जुड़े मामलों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मानवीय फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि ‘मानवीय गरिमा जीवन का अभिन्न हिस्सा है’ और जब कोई बच्चा हादसे में गंभीर या स्थायी विकलांगता का शिकार होता है, तो उसका प्रभाव केवल उसके शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके पूरे भविष्य, शिक्षा, रोजगार और जीवन जीने के तरीके को प्रभावित करता है।
इसी संवेदनशील दृष्टिकोण को अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जून 2015 में महज 6 महीने की उम्र में हादसे का शिकार हुई बच्ची का मुआवजा बढ़ाकर 83.38 लाख रुपये कर दिया।
निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक मुआवजे का सफर
न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने बच्ची की मां द्वारा दायर याचिका पर यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया:
- MACT (अधिकरण) का फैसला: मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने शुरुआत में 30.12 लाख रुपये का मुआवजा तय किया था।
- ओडिशा हाईकोर्ट का फैसला: जनवरी 2023 में हाईकोर्ट ने इसे बढ़ाकर 45.40 लाख रुपये किया।
- सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला: शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को संशोधित करते हुए बीमा कंपनी को 83.38 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
90% शारीरिक चोट, लेकिन 100% ‘कार्यात्मक विकलांगता’
पीठ ने कहा कि जून 2015 के हादसे में बच्ची की रीढ़ की हड्डी और तंत्रिका तंत्र में गंभीर चोट आई थी, जिससे उसे 90% स्थायी शारीरिक विकलांगता हुई। हालांकि, अदालत ने माना कि चूंकि बच्ची अपने दैनिक काम भी खुद नहीं कर सकती और जीवनभर दूसरों पर निर्भर रहेगी, इसलिए इसे 100 प्रतिशत कार्यात्मक विकलांगता (Functional Disability) माना जाएगा।
मोटर वाहन अधिनियम पर अदालत की अहम बातें
| बिंदु | सुप्रीम कोर्ट का रुख / टिप्पणी |
| कल्याणकारी कानून | मोटर वाहन अधिनियम, 1988 एक कल्याणकारी कानून है, जिसकी व्याख्या पीड़ित के प्रति संवेदनशीलता से होनी चाहिए। |
| वयस्कों से अलग आकलन | बच्चों में विकलांगता का आकलन वयस्कों की तरह नहीं किया जा सकता, क्योंकि बच्चे का पूरा भविष्य प्रभावित होता है। |
| नुकसान के आयाम | दुर्घटना से केवल शारीरिक क्षति नहीं होती, बल्कि शिक्षा, रोजगार, सामाजिक जीवन और आत्मसम्मान का भी नुकसान होता है। |
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में सड़क दुर्घटनाओं का शिकार हुए बच्चों के मामलों में एक मील का पत्थर (Precedent) साबित होगा।

