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Monday, June 1, 2026

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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: समान काम तो समान लाभ; प्रशासनिक ढिलाई के कारण अस्थायी कर्मचारियों को पेंशन से नहीं रोक सकती सरकार

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने सोमवार (1 जून 2026) को श्रम अधिकारों और सामाजिक न्याय के हक में एक युगांतकारी फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकार अपने ही कर्मचारियों के बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं कर सकती। कोर्ट ने साफ किया कि यदि अस्थायी या कैजुअल कर्मचारी भी पूरी तरह स्थायी कर्मचारियों की तरह ही कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं, तो उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले वित्तीय लाभों और सामाजिक सुरक्षा से वंचित रखना पूरी तरह गैर-कानूनी है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ए.जी. मसीह की खंडपीठ ने पटना हाई कोर्ट के उस पुराने आदेश को सिरे से रद्द कर दिया, जिसमें डाक विभाग (Department of Posts) में दशकों तक सेवा देने वाले अस्थायी कर्मियों को पेंशन देने से साफ इनकार कर दिया गया था।

सरकार कर्मचारियों को अनिश्चित स्थिति में नहीं रख सकती

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जिम्मेदारियों और कार्यभार के मामले में समान होने के बावजूद किसी एक विशेष वर्ग को पेंशन लाभ न देना भारतीय संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। बेंच ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, “सरकार कर्मचारियों को लंबे समय तक एक अनिश्चित स्थिति (Casual Status) में रखकर उनसे स्थायी कर्मचारियों जैसा काम नहीं ले सकती। लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारी, चाहे वे कैजुअल हों या अस्थायी, उन्हें सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसे बुनियादी अधिकारों से दूर नहीं रखा जा सकता। प्रशासनिक निष्क्रियता या ढिलाई की वजह से किसी भी नागरिक के संवैधानिक अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता।”

3 महीने में पेंशन देने का आदेश; देरी पर लगेगा 6% ब्याज

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सख्त निर्देश जारी किया है कि वह डाक विभाग में कैजुअल लेबर (नाइट गार्ड) के रूप में अपनी जिंदगी खपाने वाले पूर्व कर्मचारियों या उनके कानूनी वारिसों को अगले तीन महीने के भीतर सभी प्रकार के पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ (Retirement Benefits) अनिवार्य रूप से जारी करे। अदालत ने यह भी जोड़ा कि यदि इस भुगतान में तीन महीने से अधिक की देरी होती है, तो सरकार को छह प्रतिशत (6%) सालाना की दर से ब्याज भी चुकाना होगा। कोर्ट ने रिकॉर्ड्स को खंगालते हुए पाया कि इन कर्मियों को अस्थायी दर्जा प्राप्त था और उन्हें ग्रुप-डी (Group D) के समान वेतन व भत्ते भी दिए जा रहे थे, लेकिन विभाग की सुस्ती के कारण इन्हें कभी औपचारिक रूप से स्थायी नहीं किया गया था।

पेंशन कोई खैरात नहीं, अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति है

सर्वोच्च अदालत ने संविधान के राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (अनुच्छेद 38, 39 और 43) का विशेष रूप से हवाला देते हुए रेखांकित किया कि लोक कल्याणकारी राज्य में मजदूरों के लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना सरकार का प्राथमिक कर्तव्य है। कोर्ट ने ऐतिहासिक कानूनी सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि “पेंशन कोई खैरात, भीख या इनाम नहीं है”, बल्कि यह कर्मचारी की लंबी और निष्ठावान सेवा के बदले मिलने वाला एक अर्जित सामाजिक लाभ है। कोर्ट ने साल 2013 के एक नजीर फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि पेंशन संविधान के अनुच्छेद 300A (Article 300A) के तहत एक कानूनी संपत्ति की तरह है, जिसे किसी भी कर्मचारी से बिना उचित कानून के नहीं छीना जा सकता।

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