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Monday, June 8, 2026

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TMC का महासंकट: कोलकाता से दिल्ली पहुंचा बगावत का तूफान; ममता बनर्जी के समर्थन में उतरे कीर्ति आजाद, बोले- ‘मर जाऊंगा पर दीदी का साथ नहीं छोड़ूंगा’

नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के ऐतिहासिक और अप्रत्याशित चुनावी नतीजों ने सूबे की पूरी सियासत को पलट कर रख दिया है। इस करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने राजनीतिक इतिहास के सबसे भीषण और अस्तित्व की लड़ाई वाले संकट से जूझ रही है। बगावत की इस तेज आंधी के बीच, टीएमसी के फायरब्रांड सांसद कीर्ति आजाद अचानक दिल्ली पहुंचे हैं और उन्होंने ममता बनर्जी के प्रति अपनी अटूट वफादारी का एलान करते हुए बागियों पर तीखा हमला बोला है।

ममता बनर्जी से मुलाकात के बाद पत्रकारों से बात करते हुए कीर्ति आजाद ने गरजते हुए कहा, “जो गद्दार हैं, उनको गद्दारी करने दो। तृणमूल कांग्रेस को इन बागियों से कुछ नहीं होने वाला है। मैं ममता दीदी के साथ मजबूती से खड़ा था, आज भी खड़ा हूं और जीवन भर खड़ा रहूंगा। मैं मर जाऊंगा, लेकिन उनका साथ कभी नहीं छोड़ूंगा। विरोधियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि एक घायल शेरनी और ज्यादा खतरनाक हो जाती है।” कीर्ति आजाद का यह बयान ऐसे समय में आया है जब खुद ममता बनर्जी ‘इंडिया ब्लॉक’ (INDIA Bloc) की बैठक में शामिल होने और अपनी पार्टी के वजूद को बचाने के लिए दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं।

कोलकाता से शुरू हुआ विद्रोह: दो-तिहाई विधायकों ने की बगावत

यह अभूतपूर्व सियासी घमासान विधानसभा चुनाव के उन नतीजों के बाद शुरू हुआ, जिसने टीएमसी को राज्य की सत्ता से बेदखल कर दिया। तृणमूल कांग्रेस महज 80 सीटों पर सिमट गई है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 207 सीटें जीतकर ऐतिहासिक प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बना ली है। इस करारी हार के तुरंत बाद ही पार्टी के भीतर आंतरिक कलह का ज्वालामुखी फूट पड़ा।

टीएमसी के कुल 80 निर्वाचित विधायकों में से लगभग 58 से 59 विधायक पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के फैसले लेने के तरीके और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली के खिलाफ खुलकर बागी हो गए हैं। बागियों का यह आंकड़ा दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की कार्रवाई से बचने के लिए जरूरी दो-तिहाई संख्या बल को आसानी से पार करता है। इस बगावत को तब बड़ी वैधानिक सफलता मिली, जब पूर्व टीएमसी नेता ऋतब्रत बनर्जी को इन सभी बागी विधायकों का खुला नेता चुन लिया गया और पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष रथिन्द्र बोस ने इस बागी गुट को तुरंत मंजूरी देते हुए ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में आधिकारिक तौर पर ‘नेता प्रतिपक्ष’ घोषित कर दिया। इसी बीच, संकट को गहराते देख ममता के सिपहसालार फिरहाद हकीम ने भी कोलकाता के मेयर पद से इस्तीफा दे दिया है।

संसद में भी फूट की तैयारी: 20 बागी सांसद पहुंचे दिल्ली

कोलकाता का यह हाई-वोल्टेज सियासी ड्रामा अब पूरी तरह दिल्ली शिफ्ट हो चुका है। सूत्रों के मुताबिक, टीएमसी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 20 बागी सांसद भी दिल्ली पहुंच चुके हैं। ये सांसद जल्द ही लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) से मुलाकात कर संसद के भीतर एक अलग गुट के रूप में मान्यता देने की मांग संबंधी पत्र सौंप सकते हैं।

बागी विधायकों और सांसदों का मुख्य विरोध पार्टी में केंद्रीकृत फैसले लेने की प्रणाली और अभिषेक बनर्जी के एकतरफा नेतृत्व को लेकर है। बागी गुट की साफ और खुली मांग है कि:

  • अभिषेक बनर्जी को संगठन की मुख्य और सर्वाधिकार वाली भूमिका से तुरंत हटाया जाए।
  • ममता बनर्जी सक्रिय राजनीति और फैसलों से दूर रहकर केवल एक ‘मुख्य सलाहकार’ (Chief Advisor) के रूप में काम करें।
  • तृणमूल कांग्रेस का संचालन पूरी तरह लोकतांत्रिक और सामूहिक फैसलों के आधार पर हो।

दीदी का डैमेज कंट्रोल: राष्ट्रीय संगठन में बड़ा फेरबदल

पार्टी पर से नियंत्रण खोने के इस सबसे बड़े खतरे को देखते हुए ममता बनर्जी ने दिल्ली से ही डैमेज कंट्रोल (Damage Control) की बड़ी कवायद शुरू कर दी है। अभिषेक बनर्जी के पर कतरने और उनके प्रभाव को सीमित करने के लिए ममता बनर्जी ने पार्टी संगठन में बड़ा फेरबदल करते हुए वरिष्ठ नेता डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन को संयुक्त रूप से टीएमसी का नया ‘राष्ट्रीय सचिव’ नियुक्त कर दिया है, ताकि भविष्य के सभी फैसले सामूहिक सहमति से लिए जा सकें।

दूसरी तरफ, टीएमसी के आधिकारिक खेमे ने भाजपा पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा है कि इस पूरी बगावत और धनबल के जरिए पार्टी को अस्थिर करने के पीछे बीजेपी का हाथ है, जो महाराष्ट्र का ‘शिवसेना-NCP’ जैसा सियासी खेल अब बंगाल में दोहराना चाहती है।

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