हैदराबाद: मध्य प्रदेश के धार जिले की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर आए अदालती फैसले पर एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने इस फैसले को संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए इसकी तुलना बाबरी मस्जिद-राम मंदिर मामले से की है।
ओवैसी की प्रतिक्रिया के मुख्य बिंदु:
- बाबरी फैसले से तुलना: ओवैसी ने कहा कि भोजशाला का फैसला बिल्कुल बाबरी मस्जिद मामले की तरह ही निकला है। उन्होंने तर्क दिया कि जहाँ बाबरी मामले में कब्जे (possession) को आधार बनाया गया था, वहीं भोजशाला में मुस्लिम पक्ष का कब्जा लंबे समय से होने के बावजूद उसे नजरअंदाज किया गया।
- प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की अनदेखी: ओवैसी ने आरोप लगाया कि यह फैसला ‘प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991’ (उपासना स्थल अधिनियम) का मज़ाक है। उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी फैसले में इस कानून को संविधान के ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ का हिस्सा बताया था, लेकिन अब इसे दरकिनार किया जा रहा है।
- पुराने दस्तावेजों का हवाला: एआईएमआईएम प्रमुख ने दावा किया कि अदालत ने 1935 के धार स्टेट गजट और 1985 के वक्फ पंजीकरण जैसे महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेजों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।
- विवादों का डर: उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इसी तरह ऐतिहासिक दस्तावेजों और मौजूदा कानूनों की अनदेखी कर फैसले आते रहे, तो देश में नए धार्मिक विवादों का रास्ता खुल जाएगा।
क्या है भोजशाला का ताजा अदालती फैसला?
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की 98 दिनों तक चली वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट के आधार पर अपना निर्णय सुनाया है।
- कोर्ट का निष्कर्ष: हिंदू पक्ष के वकीलों के अनुसार, अदालत ने एएसआई की रिपोर्ट पर भरोसा जताते हुए परिसर को हिंदू मंदिर माना है।
- सर्वे का आधार: मार्च 2024 में शुरू हुए सर्वे के बाद जुलाई 2024 में रिपोर्ट पेश की गई थी, जिसमें संरचना की ऐतिहासिकता और धार्मिक प्रकृति की जांच की गई थी।
विवाद का संक्षिप्त घटनाक्रम:
- 2022: हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस द्वारा हाईकोर्ट में नई याचिका दायर।
- मार्च 2024: हाईकोर्ट के आदेश पर एएसआई सर्वे की शुरुआत।
- अप्रैल 2026: हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्षों की दलीलों के साथ नियमित सुनवाई का दौर।
- मई 2026: लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत ने फैसला सुनाया।

