भोपाल/नई दिल्ली: मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव और वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र (Nomination Paper) रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा खारिज किए जाने के बाद देश का राजनीतिक और विधिक माहौल पूरी तरह गरमा गया है। इस प्रशासनिक फैसले के विरोध में कांग्रेस समर्थकों, वरिष्ठ वकीलों, पार्टी कार्यकर्ताओं और प्रबुद्ध नागरिकों सहित करीब 300 लोगों ने एक संयुक्त मंच बनाकर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को एक बेहद कड़ा खुला पत्र (Open Letter) लिखा है।
11 जून 2026 को लिखे गए इस पत्र में हस्ताक्षरकर्ताओं ने नामांकन रद्द किए जाने की त्वरित प्रक्रिया पर गंभीर संवैधानिक चिंता व्यक्त की है। उन्होंने इसे महज एक उम्मीदवार या एक दल का राजनीतिक नुकसान न मानकर सीधे तौर पर देश की चुनावी निष्पक्षता और लोकतांत्रिक भागीदारी पर एक बड़ा संकट बताया है।
सोशल मीडिया पर खुला पत्र; नियमों और पारदर्शिता पर उठे सवाल
कांग्रेस की वरिष्ठ प्रवक्ता एवं सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता अवनी बंसल की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर साझा किए गए इस खुले पत्र में चुनाव आयोग (ECI) और देश की शीर्ष अदालत से इस मामले में तुरंत न्यायिक हस्तक्षेप करने की मांग की गई है। पत्र में मुख्य विधिक दलील देते हुए कहा गया है कि:
- किसी भी मान्यता प्राप्त दल के उम्मीदवार का नामांकन रद्द करने की शक्ति का उपयोग रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा अत्यंत संयम, पूर्ण पारदर्शिता और कानून के प्रति अटूट निष्ठा के साथ किया जाना चाहिए।
- हस्ताक्षरकर्ताओं का दावा है कि इस मामले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) के वैधानिक सुरक्षा उपायों और चुनाव आयोग के स्थापित दिशा-निर्देशों का पूरी तरह उल्लंघन किया गया है।
- चुनावी कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी नामांकन पत्र को तब तक पूरी तरह वैध (Valid) माना जाना चाहिए जब तक कि उसके विपरीत कोई अकाट्य और पुख्ता सबूत सामने न रख दिया जाए।
क्या कहता है कानून? हैंडबुक और धारा 36 का हवाला
इस खुले पत्र में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 36 का विशेष रूप से हवाला देते हुए रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले को चुनौती दी गई है। पत्र के मुताबिक, किसी भी उम्मीदवार के नामांकन पत्रों को ऐसे तकनीकी आधारों पर खारिज नहीं किया जा सकता जो बहुत गंभीर, ठोस या निर्णायक प्रकृति के न हों।
इसके साथ ही चुनाव आयोग की आधिकारिक ‘रिटर्निंग ऑफिसर्स हैंडबुक’ (Returning Officers’ Handbook) का जिक्र करते हुए यह दावा भी किया गया है कि केवल प्रतिद्वंद्वी दल के इस आरोप पर नामांकन रद्द नहीं किया जा सकता कि हलफनामे (Affidavit) में कोई गलत जानकारी दी गई है या कोई त्रुटि हुई है। पत्र में साफ तौर पर लिखा गया है कि यह घटना केवल एक उम्मीदवार या एक राजनीतिक दल की नहीं है, बल्कि यह देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने के हमारे संवैधानिक वादे की पवित्रता से जुड़ी है।
क्यों खारिज हुआ मीनाक्षी नटराजन का पर्चा?पूरा विवाद मीनाक्षी नटराजन द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे में एक कानूनी जानकारी छिपाने के आरोपों के बाद शुरू हुआ। राज्यसभा चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा द्वारा जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, नटराजन का ‘फॉर्म 26’ (Form 26) तकनीकी रूप से अधूरा पाया गया, जिसमें उनके खिलाफ लंबित एक अदालती शिकायत का जिक्र नहीं था।मध्य प्रदेश विधानसभा के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राज्यसभा उम्मीदवार महेश केवट ने लिखित शिकायत दर्ज कराई थी कि नटराजन ने तेलंगाना (Telangana) राज्य में दर्ज एक पुराने मामले की जानकारी अपने चुनावी हलफनामे में जानबूझकर छिपाई है। इसी शिकायत को आधार मानते हुए स्क्रूटनी के दौरान उनका पर्चा खारिज कर दिया गया।
फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं नटराजन; 18 जून को होना है मतदान
इस प्रशासनिक झटके और चुनावी रेस से बाहर किए जाने के फैसले के खिलाफ मीनाक्षी नटराजन ने बिना समय गंवाए कानूनी लड़ाई का रास्ता चुना है। उन्होंने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर रिटर्निंग ऑफिसर के आदेश पर तुरंत रोक लगाने और उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति देने की गुहार लगाई है।
अधिवक्ताओं के मुताबिक, इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शीर्ष अदालत से जल्द ही अर्जेंट हियरिंग (त्वरित सुनवाई) की मांग की जाएगी। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश की कुल तीन रिक्त राज्यसभा सीटों के लिए आगामी 18 जून 2026 को विधानसभा परिसर में मतदान होना तय हुआ है, जिससे पहले इस विधिक रार ने सूबे की राजनीति में भारी उबाल ला दिया है।

