त्रिशूर (केरल): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने केरल के त्रिशूर में संघ के शताब्दी वर्ष जनसंपर्क कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरएसएस के वैचारिक और सामाजिक लक्ष्यों को देश के सामने रखा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संघ की स्थापना किसी विशिष्ट समुदाय के विरोध, राजनीतिक सत्ता हासिल करने या सिर्फ लोकप्रियता पाने के लिए नहीं की गई थी, बल्कि इसका एकमात्र और मुख्य उद्देश्य पूरे भारतीय समाज को संगठित कर राष्ट्र के पुनर्जागरण (National Renaissance) का मार्ग प्रशस्त करना है।
विभाजन और कमजोरियों के कारण भारत बार-बार गुलाम हुआ: भागवत
मोहन भागवत ने स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा:
- ऐतिहासिक संदर्भ: संघ प्रमुख के अनुसार, डॉ. हेडगेवार का मानना था कि भारत इतिहास में बार-बार विदेशी ताकतों के अधीन इसलिए हुआ क्योंकि हमारा समाज आंतरिक रूप से विभाजित और कमजोर था।
- स्थायी समाधान: एक मजबूत, संगठित और अनुशासित समाज ही देश की सभी समकालीन समस्याओं का स्थायी समाधान दे सकता है। इसलिए विविधताओं के बावजूद समाज को एकजुट करना ही संघ का मूल मंत्र है।
- हिंदुत्व का विचार: उन्होंने जोर देकर कहा कि संघ का हिंदुत्व का विचार किसी भी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान ही राष्ट्रीय एकता का वास्तविक आधार है।
आरएसएस प्रमुख ने बताया कि वर्तमान में देशभर में स्वयंसेवक 1.30 लाख से अधिक सेवा परियोजनाओं (Service Projects) में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं और सामाजिक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं।
‘स्वयंसेवकों की उपलब्धियां उनकी अपनी, संघ नहीं लेता श्रेय’ — पीएम मोदी का दिया उदाहरण
राजनीतिक शक्ति और संघ के प्रभाव पर बात करते हुए मोहन भागवत ने एक बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि संघ अपने स्वयंसेवकों की व्यक्तिगत या राजनीतिक उपलब्धियों का श्रेय लेने की कभी कोशिश नहीं करता। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीधा उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक राष्ट्र जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी व्यक्तिगत क्षमता और सांगठनिक जिम्मेदारियों के आधार पर शीर्ष पदों पर काम करते हैं, और उनकी उपलब्धियां पूरी तरह उनकी अपनी मेहनत का परिणाम होती हैं। उन्होंने दोहराया कि भारत का भविष्य केवल सरकारों की नीतियों पर नहीं, बल्कि आम नागरिकों के चरित्र और उनकी सक्रिय भागीदारी पर निर्भर करता है।
‘ईसाई सदियों से भारत का अभिन्न हिस्सा, धर्म परिवर्तन पर लालच और दबाव चिंताजनक’
केरल के जनसांख्यिकीय ताने-बाने के बीच ईसाइयों पर हमलों से जुड़े संवेदनशील सवालों का बेबाकी से जवाब देते हुए सरसंघचालक ने कहा कि ईसाई समुदाय सदियों से भारत में शांतिपूर्वक रहता आया है और वे भारतीय समाज का एक बेहद अभिन्न हिस्सा हैं। हिंदू समाज स्वभाव से ही समावेशी (Inclusive) रहा है और आरएसएस न तो कभी हिंसा करता है और न ही किसी भी स्तर पर इसका समर्थन करता है। अतः ईसाई समुदाय को हिंदू समाज या संघ से किसी भी प्रकार के भय या खतरे की आशंका नहीं होनी चाहिए।
वहीं, धर्म परिवर्तन (Proselytization) के विवादित मुद्दे पर संघ के रुख को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा:
- यदि कोई भी नागरिक अपनी व्यक्तिगत आस्था, आध्यात्मिक चेतना और आंतरिक विश्वास के आधार पर स्वेच्छा से धर्म बदलता है, तो संघ को उस पर कोई आपत्ति नहीं है।
- आपत्ति और चिंता तब पैदा होती है जब इस धर्म परिवर्तन के पीछे लालच (Inducement), मानसिक या सामाजिक दबाव (Coercion) अथवा दूसरे के मूल धर्म और सनातन परंपराओं को नीचा दिखाने या बदनाम करने जैसे अनुचित तत्व शामिल होते हैं।
कानून हाथ में न लें; मतभेदों को सुलझाने के लिए ‘संवाद’ ही एकमात्र रास्ता
मोहन भागवत ने देश के नागरिकों और विभिन्न संगठनों से कानून अपने हाथ में न लेने की पुरजोर अपील की। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार की सामाजिक या धार्मिक शिकायत का निवारण केवल तय विधिक और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही होना चाहिए। हिंसा और सामाजिक टकराव से बचना राष्ट्रहित में सबसे जरूरी है और सभी पक्षों को इस पर पूर्ण संयम बरतना चाहिए।
उन्होंने अंत में कहा कि भारत की धरती पर हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और यहूदी समुदाय ऐतिहासिक रूप से लंबे समय से एक साथ सह-अस्तित्व के साथ रहते आए हैं, इसलिए समुदायों के बीच अविश्वास या भय का माहौल बिल्कुल नहीं होना चाहिए। किसी भी प्रकार के वैचारिक मतभेद को दूर करने के लिए लगातार आपसी संवाद (Dialogue) बनाए रखना ही आगे बढ़ने का सबसे सुरक्षित और सर्वोत्तम रास्ता है।

