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भारत एक साथ दो महामारी से जूझ रहा, पहला कोरोना के प्रकोप से दूसरा प्रधानमंत्री मोदी के घमंड और निरंकुश आत्म विश्वास से ! – गार्डियन

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भारत एक साथ दो महामारी से जूझ रहा, कोरोना महामारी के भयानक रूप लेने का एक कारण यह है कि इस देश के प्रधानमंत्री मोदी के मन में यह घमंड पैदा हो गया है कि भारत इस महामारी के मामले में अपवाद है। यही कारण रहा कि भारत ने कोरोना से निपटने के लिए उचित तैयारी नहीं की, ख़ास तौर पर वैक्सीन के उत्पादन में भारी कोताही हुई।

भारत एक साथ दो महामारी से जूझ रहा

ब्रिटिश अख़बार गार्डियन ने लिखा कि भारत में जहां कोविड-19 ने हाहाकार मचा रखा है उसकी सबसे बड़ी पीड़ा इस देश के प्रधानमंत्री मोदी हैं जिनके भीतर सीमा से अधिक आत्म विश्वास भर गया है और उन्हें अपने भ्रष्ट विशेषज्ञों पर बड़ा यक़ीन है।

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मार्च के शुरू में मोदी सरकार यह मान बैठी थी कि भारत में कोविड-19 का खेल अब ख़त्म हो चुका है। मगर आज हालत यह है कि भारत कोरोना के चलते नरक बन चुका है।

अख़बार ने भारत में कोरोना के नए वेरिएंट सामने आने का हवाला देते हुए लिखा है कि इस त्रास्दी के बाद भारत के अस्पतालों में बेड और आक्सीजन की भारी क़िल्लत हो गई है, क़ब्रिस्तानों में जगह कम पड़ जाने के कारण घरों में लाशें सड़ने की नौबत आ गई है। कुछ कल्याणकारी संस्थाओं ने यह चेतावनी भी दी है कि हालात यही रहे तो लोग सड़कों पर लाशें रखकर चले जाएंगे।

अनेक देशों ने भारत के लिए उड़ानें बंद कर दी हैं और इस देश की यात्रा पर रोक लगा दी है।

यह हालत हो गई है मगर मोदी को देखिए तो कहते है कि भारत पूरी दुनिया का मेडिकल स्टोर बन चुका है जबकि भारत में अब तक मुश्किल से 1 प्रतिशत लोगों को ही वैक्सीन लग पाया है।

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अख़बार ने आगे लिखा कि भारत में क्रिकेट स्टेडियम में भीड़ जमा हुई और गंगा स्नान के लिए कुंभ मेले में भारी भीड़ एकत्रित हो गई।

गार्डियन ने मोदी की तुलना अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प से की जिन्होंने महामारी फैली होने के बावजूद अपनी चुनावी कैंपेन धूमधाम से आगे बढ़ाया।

अख़बार ने लिखा कि भारत ने पांच राज्यों में अप्रैल महीने में चुनाव करवाया और चुनावी सभाओं में लाखों की भीड़ जमा हुई जिसमें कोई भी मास्क पहनने का कष्ट करने के लिए तैयार नहीं था।

अख़बार ने लिखा है कि मोदी को यह घमंड हो गया है कि भारत अपवाद है, इसीलिए वह महामारी से निपटने की सही ढंग से तैयारी करना ही नहीं चाहते।

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यह सही है कि किसी समय पश्चिमी नेताओं ख़ास तौर पर जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल ने कहा था कि भारत को दुनिया में दवाओं के उत्पादन का केन्द्र बन जाना चाहिए मगर लगता है कि यह सोच ग़लत थी।

कोरोना महामारी के बारे में मोदी के पास सोच और नीति के भारी अभाव का हवाला देते हुए अख़बार ने लिखा कि पिछले साल तो मोदी ने एक अरब तीस करोड़ की आबादी वाले भारत में कठोर लाकडाउन लगा दिया और इसके बारे में पहले कोई सूचना भी नहीं दी गई। देश में बड़े विशेषज्ञ इसके पक्ष में नहीं थे मगर मोदी ने अपनी मनमानी की।

भारत में यह सोच फैल गई कि इस देश में युवा आबादी ज़्यादा है इसलिए वह उन देशों की तुलना में अधिक सुरक्षित है जहां आबादी में बुज़ुर्गों की हिस्सा अधिक है मगर इस सोच का वैज्ञानिक आधार नहीं है। मोदी ने भी इस सोच में सुधार करने की कोई कोशिश नहीं की।

(सौ. पी.टी. / गार्डियन)

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