नई दिल्ली: दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग (Health Department) में सामने आया करोड़ों रुपये का कथित खरीद घोटाला (Procurement Scam) किसी सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म की पटकथा जैसा रूप ले चुका है। सतर्कता निदेशालय (Vिजिलेंस डिपार्टमेंट) द्वारा तैयार की गई एक आधिकारिक रिपोर्ट से बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। जब जांच टीम पुख्ता सबूत और फाइलें जब्त करने पहुंची, तो मुख्य आरोपी अधिकारी दफ्तर से रहस्यमयी तरीके से चंपत हो गए और सरकारी रिकॉर्ड को अपनी ‘निजी संपत्ति’ की तरह अलमारियों में बंद कर दिया।
1. 18 मई की शाम: 30 मिनट के भीतर मुख्य आरोपी फरार
विजिलेंस की रिपोर्ट के अनुसार, 18 मई 2026 की दोपहर बाद करीब 4:30 बजे जांच टीम रिकॉर्ड जब्त करने के लिए स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के मुख्य कार्यालय पहुंची:
- अधिकारियों का चक्रव्यूह: दस्तावेज मांगने पर डीजीएचएस की महानिदेशक डॉ. वत्सला अग्रवाल ने केंद्रीय खरीद एजेंसी (CPA) के प्रभारी डॉ. विनोद कुमार रंगा को फोन मिलाया। डॉ. रंगा ने फोन पर पुष्टि की कि वे शकरपुर स्थित अपने दफ्तर में ही मौजूद हैं।
- दफ्तर पहुंचे तो ताला मिला: विजिलेंस की टीम तुरंत शकरपुर के लिए रवाना हुई और ठीक शाम 5:00 बजे वहां पहुंची। लेकिन वहां पहुंचते ही टीम के होश उड़ गए; डॉ. रंगा महज कुछ ही मिनट पहले अपने दफ्तर से विधिक रूप से गायब हो चुके थे और उनका मोबाइल फोन भी स्विच ऑफ था।
- अगले ही दिन मेडिकल लीव: इस पूरी घटनाक्रम में हैरानी की बात यह रही कि गायब होने के ठीक अगले दिन यानी 19 मई 2026 को विभाग में सूचना आई कि डॉ. रंगा अचानक ‘मेडिकल लीव’ (चिकित्सा अवकाश) पर चले गए हैं।
2. ‘स्टोन वॉलिंग’: जांच में जानबूझकर अड़ंगा लगाने की विधा
विजिलेंस टीम जब शकरपुर कार्यालय में फंसी रही, तो वहां मौजूद अन्य कनिष्ठ अधिकारियों ने जांच में सहयोग करने के बजाय असहयोग का रास्ता चुना:
विजिलेंस जांच और अड़ंगों का विवरण⎩⎨
⎧1. आवास पर मैसेंजर:2. अधिकारियों का इनकार:3. कस्टडी का बहाना:4. हस्ताक्षर से मना:डॉ. रंगा के पश्चिम विहार स्थित घर विशेष दूत भेजा गया, पर घरेलू नौकरानी ने कहा साहब घर पर नहीं हैं।दफ्तर में मौजूद डॉ. राजेश कुमार और डॉ. कुसुम अरोड़ा ने फाइलें सौंपने से साफ मना कर दिया।तर्क दिया गया कि तमाम फाइलें डॉ. रंगा की ’व्यक्तिगत कस्टडी’ में हैं और उनकी अनुपस्थिति में कोई उसे छू नहीं सकता।टीम रात 10:15 बजे तक दफ्तर में डटी रही, लेकिन कर्मचारियों ने फाइलों की सूची पर हस्ताक्षर तक नहीं किए।
3. रिकॉर्ड हासिल करने के लिए 12 दिनों तक संघर्ष
विजिलेंस विभाग सरकारी कागजात जुटाने के लिए करीब 12 दिनों तक विधिक रूप से जूझता रहा। 19 मई को पहली बार आधिकारिक लिखित समन भेजा गया। इसके बाद 21 मई को दोबारा पत्र जारी हुआ। 25 मई को अंतिम समय-सीमा (शाम 5 बजे तक) तय की गई, लेकिन इसके बावजूद मुख्य तकनीकी दस्तावेज नहीं दिए गए। आखिरकार, 29 मई 2026 को सतर्कता निदेशालय ने इस गंभीर ‘स्टोन वॉलिंग’ (जांच को बाधित करने की प्रक्रिया) को देखते हुए मामले की विधिक एफआईआर (FIR) दर्ज करने की सिफारिश के साथ पूरा केस भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (ACB) को सौंप दिया।
4. इन चार मुख्य फाइलों को छिपाने की हुई गहरी साजिश
जांच एजेंसियों के अनुसार, जिन फाइलों को ताले में बंद करके छिपाने की कोशिश की गई, उनमें बाजार मूल्य से कई गुना अधिक कीमतों पर की गई विधिक व वित्तीय खरीद के पुख्ता प्रमाण दर्ज हैं:
- ORS टेंडर घोटाला: ओआरएस (ORS) के मात्र ₹2.5 मूल्य वाले पैकेट को सरकार के लिए ₹15 प्रति पैकेट की दर से खरीदने से जुड़ी टेंडर फाइल।
- पोर्टेबल एक्स-रे मशीन: बाजार में जिस पोर्टेबल एक्स-रे मशीन की विधिक कीमत लगभग ₹10 लाख है, उसे ₹33 लाख की अत्यधिक दरों पर खरीदने का रिकॉर्ड।
- बेडशीट और लिनेन घोटाला: दिल्ली के सरकारी अस्पतालों के लिए बेहद घटिया दर्जे के लिनेन और बेडशीट को वीवीआईपी दामों पर खरीदने की फाइल।
- जीवन रक्षक उपकरण: एनेस्थीसिया स्टेशन (Anesthesia Station) और सी-आर्म (C-Arm) जैसी बेहद संवेदनशील व महंगी मेडिकल मशीनों के टेंडर आवंटन में की गई विधिक धांधली।
सतर्कता विभाग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि सरकारी रिकॉर्ड किसी भी लोक सेवक की निजी बपौती नहीं हो सकते। इन्हें इस तरह छिपाना सीधे तौर पर आपराधिक साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की श्रेणी में आता है, जिसके लिए डॉ. रंगा और उनके सहयोगियों पर विधिक कानून का शिकंजा कसना तय है।

