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Thursday, June 18, 2026

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केंद्र सरकार में प्रमोशन कोटे की आरक्षित सीटों को ‘अनारक्षित’ करने के नियमों में संशोधन: अब 2 सप्ताह के बजाय 1 महीने तक करना होगा इंतजार; DoPT ने जारी किया नया आदेश

नई दिल्ली: केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में पदोन्नति (Promotion) के दौरान आरक्षित सीटों को गैर-आरक्षित (De-reserve) करने की प्रक्रिया को लेकर मोदी सरकार ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील विधिक संशोधन किया है। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, पदोन्नति कोटे में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षित खाली पदों को सामान्य श्रेणी में बदलने से पहले दी जाने वाली समय-सीमा को अब बढ़ा दिया गया है।

पहले जहां प्रशासनिक मंत्रालयों और विभागों को इस तरह के मामलों पर टिप्पणियों के लिए केवल दो सप्ताह (14 दिन) का समय मिलता था, उसे अब संशोधित कर एक महीना (30 दिन) कर दिया गया है। यानी अब केंद्र सरकार के विभागों को आरक्षण हटाने का अंतिम विधिक निर्णय लेने से पहले डीओपीटी और संबंधित संवैधानिक राष्ट्रीय आयोगों की टिप्पणियों के लिए कम से कम एक महीने तक अनिवार्य रूप से इंतजार करना होगा।

तीन संवैधानिक राष्ट्रीय आयोगों से विधिक सलाह अनिवार्य

डीओपीटी ने साफ किया है कि इस संशोधित समय-सीमा के संबंध में देश के तीनों प्रमुख विधिक और संवैधानिक निकायों को पूरी तरह अवगत करा दिया गया है। इन आयोगों की भूमिका और कार्यक्षेत्र निम्नलिखित हैं:

  • एससी (SC) पदों के लिए: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC)
  • एसटी (ST) पदों के लिए: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST)
  • ओबीसी (OBC) पदों के लिए: राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC)

विधिक प्रावधानों के अनुसार, यदि तय की गई एक महीने की इस समय-सीमा के भीतर डीओपीटी या इनमें से किसी भी आयोग की कोई विशिष्ट टिप्पणी, आपत्ति या सुझाव प्राप्त होता है, तो संबंधित मंत्रालय को अंतिम निर्णय लेने से पहले उन टिप्पणियों पर गहराई से विचार करना विधिक रूप से अनिवार्य होगा।

सीधी भर्ती (Direct Recruitment) में आरक्षण हटाने पर ‘सामान्य रोक’ जारी
डीओपीटी के मौजूदा कड़े विधिक निर्देशों के तहत, सीधी भर्ती के मामलों में आरक्षित खाली पदों को अनारक्षित करने पर पूर्ण और सामान्य प्रतिबंध (General Ban) लागू रहेगा। हालांकि, केवल अत्यंत दुर्लभ और असाधारण मामलों में— जहां जनहित या राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए ‘ग्रुप ए’ (Group A) के किसी अति-महत्वपूर्ण पद को खाली नहीं छोड़ा जा सकता— निम्नलिखित विशेष प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाई जाती है:

  1. सचिवों की समिति: संबंधित आयोगों से राय लेने के बाद प्रस्ताव को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, डीओपीटी और संबंधित प्रशासनिक मंत्रालय के सचिवों की एक उच्च-स्तरीय समिति को भेजा जाता है।
  2. प्रभारी मंत्री की मंजूरी: समिति की सिफारिशों पर अंत में सीधे DoPT के प्रभारी मंत्री (प्रधानमंत्री) विचार करते हैं, और उनकी अंतिम विधिक स्वीकृति मिलने के बाद ही सीधी भर्ती वाली रिक्तियों को अनारक्षित किया जा सकता है।

प्रमोशन वैकेंसी को ‘डी-रिज़र्व’ करने के लिए क्या हैं विधिक शर्तें?

पदोन्नति (प्रमोशन) के माध्यम से भरी जाने वाली रिक्तियों को अनारक्षित करने की विधिक शक्तियां हालांकि प्रशासनिक मंत्रालयों/विभागों को सौंपी गई हैं, लेकिन नया नियम लागू होने के बाद अब वे निम्नलिखित सख्त शर्तों के पूरा होने पर ही ऐसा कर सकेंगे:

क्रम संख्याआवश्यक विधिक और प्रशासनिक शर्तें (Mandatory Conditions)
01विचार का दायरा (Zone of Consideration) या विस्तारित दायरे में आरक्षित श्रेणी का कोई भी पात्र उम्मीदवार उपलब्ध न हो।
02विभाग के अधिकृत संपर्क अधिकारी (Liaison Officer) ने आरक्षण हटाने के प्रस्ताव पर अपनी लिखित और विधिक सहमति दी हो।
03मंत्रालय के संबंधित संयुक्त सचिव (Joint Secretary) द्वारा उक्त प्रस्ताव की फाइल को औपचारिक रूप से मंजूरी दी गई हो।

अगर एक महीने में कोई टिप्पणी नहीं आई तो क्या होगा?

नए नियमों के अनुसार, यदि प्रस्ताव भेजने की तिथि से लेकर एक महीने के भीतर डीओपीटी या संबंधित राष्ट्रीय आयोगों की तरफ से कोई भी लिखित टिप्पणी या जवाब प्राप्त नहीं होता है, केवल उसी विधिक स्थिति में संबंधित प्रशासनिक मंत्रालय/विभाग उस प्रमोशन वाली वैकेंसी को स्वतः ‘डी-रिज़र्व’ (आरक्षण-मुक्त) करने का अंतिम प्रशासनिक फैसला लेने के लिए स्वतंत्र होगा।

डीओपीटी ने स्पष्ट किया है कि समय अवधि के इस संशोधन को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के साथ गहन विचार-विमर्श और सहमति के बाद ही अंतिम रूप दिया गया है। इसके अलावा, बाकी सभी नियम और विधिक शर्तें वर्ष 2009 के ऐतिहासिक कार्यालय ज्ञापन (OM) के अनुसार ही यथावत लागू रहेंगी। केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों और सार्वजनिक उपक्रमों को निर्देश दिया गया है कि वे इस बदली हुई विधिक समय-सीमा की विस्तृत जानकारी अपने सभी अधीनस्थ विभागों और संबंधित अधिकारियों तक तुरंत प्रसारित करें।

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