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Sunday, May 17, 2026

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नीट पेपर लीक और सीबीएसई के नए नियमों पर राहुल गांधी का सरकार पर हमला; शिक्षा मंत्रालय को बताया ‘आपदाओं का विभाग’

नई दिल्ली: कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने नीट (NEET) पेपर लीक और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के हालिया फैसलों को लेकर केंद्र सरकार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर तीखा हमला बोला है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा मंत्रालय अब ‘आपदाओं का विभाग’ बन चुका है और इसने देश के हर आयु वर्ग के छात्रों को निराश किया है।

राहुल गांधी के सरकार पर मुख्य आरोप

राहुल गांधी ने अपने पोस्ट के जरिए छात्रों से जुड़े तीन बड़े मुद्दों को रेखांकित किया:

  • नीट पेपर लीक: उन्होंने कहा कि नीट पेपर लीक की वजह से देश के करीब 22 लाख छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है।
  • सीबीएसई का ओएसएम सिस्टम: कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि सीबीएसई कक्षा 12 के छात्रों को खराब ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) सिस्टम के कारण उम्मीद से कम अंक मिले, जिससे कई होनहार छात्र प्रतिष्ठित कॉलेजों में दाखिले की पात्रता से वंचित रह गए।
  • कक्षा 9 के छात्रों पर अतिरिक्त बोझ: उन्होंने कहा कि 1 जुलाई से कक्षा 9 के लाखों छात्रों पर अचानक एक नई भाषा सीखने का दबाव बनाया जा रहा है, जबकि स्कूलों में इसके लिए न तो शिक्षक उपलब्ध हैं और न ही किताबें। राहुल गांधी ने तंज कसते हुए कहा, “14 साल के बच्चों को ‘अस्थायी’ तौर पर कक्षा 6 की किताबें दी जा रही हैं।”
    क्या है सीबीएसई का नया भाषा नियम?
  • राहुल गांधी की इस आलोचना के केंद्र में सीबीएसई द्वारा 15 मई को जारी किया गया एक नया सर्कुलर है। इस सर्कुलर के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
  • तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य: शैक्षणिक सत्र 2026-27 से सीबीएसई ने कक्षा 9वीं में आने वाले सभी छात्रों के लिए तीन भाषाओं (R3) की पढ़ाई को अनिवार्य कर दिया है।
  • भारतीय भाषाओं पर जोर: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (NCF) 2023 के दिशानिर्देशों के तहत, इन तीन भाषाओं में से कम से कम दो भाषाएं भारतीय मूल की होनी चाहिए।
  • बोर्ड परीक्षा में छूट: हालांकि, छात्रों को राहत देते हुए बोर्ड ने साफ किया है कि कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा में इस तीसरी भाषा के पेपर से छूट दी जाएगी।
  • विपक्ष के इन आरोपों के बाद शिक्षा व्यवस्था, परीक्षाओं की शुचिता और नए नीतिगत बदलावों को जमीन पर लागू करने के तरीकों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

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