कोलकाता: कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई हिंदू महिला किसी मुस्लिम पुरुष से इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह करती है, तो प्रारंभिक तौर पर ऐसी शादी को ‘अनियमित’ (Irregular) माना जा सकता है, लेकिन इसे पूरी तरह ‘अमान्य’ (Void) नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने साफ किया कि जब तक कोई सक्षम कोर्ट ऐसी शादी को अवैध घोषित नहीं कर देती, तब तक पति अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देने के अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हट सकता।
इस टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसके तहत महिला और उसके बच्चे को अंतरिम गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया गया था।
## केस स्टडी: अंतर्धार्मिक विवाह और गुजारा भत्ते का अधिकार
1. मामला क्या था?
एक हिंदू महिला ने इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार एक मुस्लिम व्यक्ति से विवाह किया था। बाद में महिला ने आरोप लगाया कि उसके पति ने न केवल उसे बेसहारा छोड़ दिया, बल्कि उसके साथ घरेलू हिंसा भी की। महिला ने न्याय के लिए पश्चिम बर्धमान जिले की मजिस्ट्रेट कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
2. निचली अदालतों के विरोधाभासी फैसले
- मजिस्ट्रेट कोर्ट का आदेश: मजिस्ट्रेट कोर्ट ने महिला की दलीलों को सही पाते हुए उसके लिए 5,000 रुपये और उसके नाबालिग बेटे के लिए 4,000 रुपये प्रति माह का अंतरिम गुजारा भत्ता तय किया।
- रिवीजन (ऊपरी) कोर्ट का यू-टर्न: फरवरी 2024 में, पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए आसनसोल के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (रिवीजन कोर्ट) ने तकनीकी आधारों का हवाला देते हुए मजिस्ट्रेट कोर्ट के इस जनहितैषी आदेश को रद्द कर दिया था।
3. कलकत्ता हाईकोर्ट का हस्तक्षेप और फटकार
रिवीजन कोर्ट के फैसले के खिलाफ महिला ने हाईकोर्ट में अपील की। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस चैताली चटर्जी (दास) की एकल पीठ ने रिवीजन कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा:
“रिवीजन कोर्ट ने कानून के स्थापित सिद्धांतों पर सही तरीके से विचार नहीं किया और अपने न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करने में विफल रही। केवल तकनीकी आधार पर गुजारा भत्ते को रोकना सामाजिक न्याय के उस उद्देश्य को नुकसान पहुँचाता है, जो महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया है।”
हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट कोर्ट का मूल आदेश बहाल करते हुए पति को तुरंत तयशुदा अंतरिम गुजारा भत्ता भुगतान करने का निर्देश दिया।
## जानें क्या कहता है कानून: मुस्लिम पर्सनल लॉ और गुजारा भत्ता
जस्टिस चैताली चटर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने ऐतिहासिक फैसलों और मुस्लिम पर्सनल लॉ की बारीकियों का हवाला देते हुए इस मामले को कानूनी रूप से परिभाषित किया:
- इस्लामी कानून में विवाह के प्रकार: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार शादियां तीन प्रकार की होती हैं:
- वैध (Sahih): जो पूरी तरह कानूनी और धार्मिक रूप से सही हो।
- अनियमित (Fasid): जिसमें कुछ अस्थायी कमियां हों (जैसे अलग धर्म में शादी), जिसे बाद में सुधारा जा सके।
- अमान्य (Batil): जो कानूनन पूरी तरह शून्य या अवैध हो।
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- हिंदू महिला और मुस्लिम पुरुष का विवाह: कोर्ट ने कहा कि एक हिंदू महिला और मुस्लिम पुरुष के बीच हुआ विवाह ‘अनियमित’ (Fasid) की श्रेणी में आता है, इसे पूरी तरह ‘अमान्य’ (Batil) नहीं कहा जा सकता। इसलिए, पत्नी गुजारा भत्ते की हकदार है।
- दस्तावेजों की प्रामाणिकता: महिला ने अदालत के समक्ष विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र (Marriage Registration Certificate) और बच्चे का जन्म प्रमाण पत्र पेश किया था। कोर्ट ने कहा कि पति महज मौखिक इनकार करके इन सरकारी दस्तावेजों को खारिज नहीं कर सकता।
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## फैसले का सामाजिक और कानूनी महत्व
यह फैसला देश में अंतर्धार्मिक विवाहों (Interfaith Marriages) के बाद पैदा होने वाले विवादों में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित करने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वैवाहिक विवादों में पुरुष तकनीकी या धार्मिक कमियों का बहाना बनाकर अपनी पत्नी और बच्चों को लाचार नहीं छोड़ सकते। सामाजिक कल्याण और जीवन के अधिकार से जुड़े कानून किसी भी पर्सनल लॉ की तकनीकी जटिलताओं से ऊपर हैं।

