नई दिल्ली: विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने वैश्विक मंच पर भारत के कूटनीतिक और रणनीतिक रुख को एक बार फिर पूरी तरह स्पष्ट किया है। मंगलवार (9 जून 2026) को डीडी इंडिया (DD India) को दिए गए एक विशेष और विस्तृत साक्षात्कार में विदेश मंत्री ने वैश्विक महाशक्तियों के साथ देश के समीकरणों पर बेबाकी से बात की। उन्होंने दृढ़ता से कहा कि दुनिया को यह हमेशा पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए कि वर्तमान सरकार बिना किसी संकोच के केवल ‘भारत-पहले’ (India-First) नीति का पालन करती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के दौर में सरकार द्वारा लिए जाने वाले किसी भी अंतरराष्ट्रीय फैसले की असली और अंतिम कसौटी यही होनी चाहिए कि वह हमारे राष्ट्र के सर्वोच्च हित में है या नहीं।
प्रमुख ताकतों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं: जयशंकर
‘विदेश नीति के 12 साल’ विषय पर बात करते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने समकालीन वैश्विक कूटनीति की जटिलताओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज के अत्यंत तनावपूर्ण और प्रतिस्पर्धी वैश्विक परिदृश्य में कूटनीति (Diplomacy) का सबसे अहम हिस्सा यही है कि दुनिया की प्रमुख ताकतों और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच अपने देश की रणनीतिक स्थिति को कैसे अधिक मजबूत और बेहतर बनाया जाए। उन्होंने स्वीकार किया कि वर्तमान वैश्विक हालातों में विभिन्न देशों के साथ संतुलन साधते हुए अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना कोई आसान काम नहीं है।
अमेरिका की तर्ज पर भारत को भी ‘भारत-पहले’ नीति पर रहना होगा अडिग
चीन और अमेरिका जैसी महाशक्तियों के साथ बदलते संबंधों से जुड़े अहम सवालों का जवाब देते हुए डॉ. जयशंकर ने एक व्यावहारिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण पेश किया। उन्होंने कहा, “आज संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) वैश्विक पटल पर खुले तौर पर और पूरी आक्रामकता के साथ ‘अमेरिका पहले’ (America First) की नीति की वकालत करता है। ऐसी स्थिति में भारत को भी पूरी संप्रभुता और स्वतंत्रता के साथ अपनी ‘भारत-पहले’ नीति पर पूरी तरह स्पष्ट और अडिग रहना चाहिए।”
टैरिफ से सभी प्रभावित, पर भारत NATO का हिस्सा नहीं; रूस-जापान से संबंध स्थिर
अमेरिकी नीतियों के वैश्विक प्रभाव का तकनीकी विश्लेषण करते हुए विदेश मंत्री ने कुछ महत्वपूर्ण बिंदु साझा किए:
- नाटो का प्रभाव नहीं: अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के साथ अपने जुड़ाव और रक्षा प्राथमिकताओं के तरीकों में कई बड़े बदलाव किए हैं। लेकिन कूटनीतिक रूप से कई मामलों में इसका भारत पर कोई सीधा नकारात्मक असर नहीं पड़ा, क्योंकि भारत उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) का सदस्य नहीं है और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति चलाता है।
- वैश्विक टैरिफ: हालांकि, उन्होंने माना कि दुनिया का हर देश अमेरिकी टैरिफ (शुल्क), अमेरिकी बाजार तक पहुंच की शर्तों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा क्षेत्रीय विवादों पर अमेरिका के बदलते रुख से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जरूर प्रभावित हुआ है।
- स्थिर साझेदारी: जयशंकर ने आश्वस्त किया कि रूस (Russia) और जापान (Japan) के साथ भारत के पारंपरिक संबंध पूरी तरह स्थिर और मजबूत बने हुए हैं।
चीन के साथ राजनीतिक संबंध सुधरे, लेकिन 2020 से पहले जैसी स्थिति नहीं
पड़ोसी देश चीन (China) के साथ जारी सीमा गतिरोध और कूटनीतिक तल्खी पर बात करते हुए विदेश मंत्री ने एक संतुलित समीक्षा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के सीमावर्ती क्षेत्रों में साल 2020 (गलवान घाटी संघर्ष) के बाद से शांति और पारस्परिक स्थिरता बुरी तरह प्रभावित हुई थी।
हालांकि, उन्होंने सकारात्मक संकेत देते हुए कहा, “पिछले एक साल (2025-2026) के दौरान दोनों देशों के राजनयिक प्रयासों के चलते सीमावर्ती हालात में कुछ हद तक सुधार अवश्य देखा गया है और दोनों के बीच राजनीतिक संबंधों में भी प्रगति हुई है। लेकिन इसके बावजूद मैं यह स्पष्ट कर दूं कि भारत-चीन संबंध अभी भी पूरी तरह सामान्य या 2020 से पहले जैसे नहीं हुए हैं।”
यूरोप के साथ हुआ कूटनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा सुधार
साक्षात्कार के दौरान विदेश मंत्री ने एक महत्वपूर्ण रणनीतिक उपलब्धि का खुलासा करते हुए कहा कि हाल के वर्षों में भारत के सभी कूटनीतिक संबंधों में सबसे बड़ा और अभूतपूर्व सुधार यूरोप (Europe) के साथ दर्ज किया गया है। उन्होंने बताया कि यूरोपीय देशों और भारत के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) और नई रणनीतिक साझेदारियों (Strategic Partnerships) ने दोनों क्षेत्रों के बीच आर्थिक और तकनीकी सहयोग को पहले से कहीं अधिक मजबूत, गतिशील और ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंचा दिया है।

