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Thursday, June 18, 2026

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‘हिंदू-मुस्लिम संघर्ष अब खत्म हो, सबका डीएनए एक’: RSS प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर का बड़ा बयान; भारतीय मुस्लिमों को दी इंडोनेशिया से सीखने की सलाह

पुणे: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने देश के सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने से जुड़े कई अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दों पर संघ का आधिकारिक व स्पष्ट रुख सामने रखा है। पुणे में पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत के दौरान उन्होंने हिंदू-मुस्लिम संबंधों, जनसंख्या संतुलन (Population Balance) और संघ की वैधानिक व वित्तीय स्थिति को लेकर कई बड़े बयान दिए। सुनील आंबेकर ने जोर देकर कहा कि देश में सदियों से चले आ रहे हिंदू-मुस्लिम संघर्ष को अब हमेशा के लिए समाप्त होना चाहिए, क्योंकि वैज्ञानिक और ऐतिहासिक रूप से सभी भारतीयों का डीएनए ($DNA$) एक ही है।

इसके साथ ही उन्होंने भारतीय मुस्लिम समाज को एक नई दिशा दिखाते हुए कहा कि उन्हें सांस्कृतिक और सामाजिक आदर्शों के लिए पाकिस्तान (Pakistan) की ओर देखने के बजाय इंडोनेशिया (Indonesia) के मॉडल का अध्ययन करना चाहिए। उनके इस बयान के बाद देश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में एक नई वैचारिक बहस छिड़ गई है।

हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर RSS नेता का ऐतिहासिक दृष्टिकोण

सुनील आंबेकर ने दोनों समुदायों के बीच ऐतिहासिक मतभेदों का विधिक व सामाजिक विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित मुख्य बातें कहीं:

  • विभाजनकारी सोच पर प्रहार: उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू-मुस्लिम विवाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गठन (1925) से भी बहुत पहले का है। समय के साथ कुछ कट्टरपंथियों ने समाज में यह भ्रामक धारणा फैला दी कि धर्म परिवर्तन करने के साथ ही व्यक्ति का राष्ट्र, संस्कृति और इतिहास भी पूरी तरह बदल जाता है।
  • विभाजन की पृष्ठभूमि: आंबेकर के अनुसार, इसी अलगाववादी और संकीर्ण सोच ने आगे चलकर वर्ष 1947 में देश के दर्दनाक विभाजन की पृष्ठभूमि तैयार की थी।
  • सुधारों का स्वागत: उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि इस पुराने संघर्ष को पूरी तरह भुलाकर राष्ट्र निर्माण में जुटा जाए। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता जताई कि वर्तमान में मुस्लिम समाज के भीतर से ही कई प्रगतिशील सामाजिक सुधारों (Social Reforms) के सकारात्मक प्रयास सामने आ रहे हैं, जो देश के भविष्य के लिए एक बेहद शुभ संकेत हैं।

भारतीय मुस्लिमों के लिए इंडोनेशिया का उदाहरण क्यों?
संघ के प्रचार प्रमुख ने भारतीय मुसलमानों को सांस्कृतिक दृष्टि से इंडोनेशिया के समाज को समझने की सलाह दी। इसके पीछे उन्होंने दो मुख्य तार्किक कारण बताए:

  1. सांस्कृतिक जड़ों का सम्मान: इंडोनेशिया में दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी निवास करती है, लेकिन इसके बावजूद वहां की राष्ट्रीय पहचान, विमानन सेवा (गरुड़), और आम जनजीवन में हिंदू व बौद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रभाव आज भी पूरी गरिमा के साथ स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
  2. धार्मिक बनाम सांस्कृतिक पहचान: आंबेकर का स्पष्ट संकेत था कि पूजा पद्धति या धार्मिक पहचान बदलने से किसी भी नागरिक को अपनी मूल भारतीय सांस्कृतिक जड़ों, पूर्वजों और परंपराओं से नाता नहीं तोड़ना चाहिए। पाकिस्तान की कट्टरपंथी सोच के बजाय इंडोनेशिया की समावेशी संस्कृति भारत के सामाजिक सद्भाव के लिए अधिक उपयुक्त है।

जनसंख्या नियंत्रण नहीं, ‘जनसंख्या संतुलन’ पर संघ का जोर

हाल ही में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा हिंदू परिवारों के संदर्भ में दिए गए बयानों और तीन बच्चों की नीति की वकालत से जुड़े सीधे सवाल पर सुनील आंबेकर ने संघ की नीति स्पष्ट की:

  • वैश्विक संदर्भ: उन्होंने कहा कि वर्तमान में यूरोप, जापान और चीन जैसे दुनिया के कई बड़े देशों को अपनी पुरानी और कठोर जनसंख्या नियंत्रण नीतियों के दुष्परिणामों (बूढ़ी होती आबादी) के कारण अब अपनी नीतियों पर गंभीर पुनर्विचार करना पड़ रहा है।
  • संतुलन आवश्यक: भारत के संदर्भ में संघ का मुख्य जोर जनसंख्या नियंत्रण पर नहीं, बल्कि जनसंख्या के जनसांख्यिकीय संतुलन (Demographic Balance) को बनाए रखने पर है।
  • निर्णय की स्वतंत्रता: हालांकि, उन्होंने पूर्ण विधिक स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि संघ की ओर से किसी भी परिवार या समाज पर बच्चों की संख्या को लेकर कोई कड़ा निर्देश, नियम या दबाव नहीं है। भारत का प्रत्येक परिवार अपनी आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

प्रियांक खरगे के आरोपों पर पलटवार; संघ की वैधानिक और वित्तीय स्थिति साफ की

कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियांक खरगे द्वारा हाल ही में आरएसएस की कानूनी स्थिति, पंजीकरण और उसकी आय के स्रोतों पर उठाए गए तीखे सवालों का जवाब देते हुए आंबेकर ने संगठन की विधिक स्थिति को पूरी तरह साफ किया।

विधिक बिंदु (Legal Aspects)आंबेकर द्वारा दिया गया विधिक स्पष्टीकरण
कानूनी मान्यताआरएसएस देश का एक पूरी तरह से कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त और स्थापित सामाजिक संगठन है।
प्रशासनिक अनुमतियांसंघ की राष्ट्रीय व स्थानीय गतिविधियों को हर स्तर पर सक्षम सरकारी और विधिक अनुमति मिलती है।
पथ संचलन नियमसंघ द्वारा समय-समय पर निकाले जाने वाले ‘पथ संचलनों’ (रूट मार्च) के लिए स्थानीय पुलिस प्रशासन से विधिवत मंजूरी ली जाती है।
वित्तीय पारदर्शितासंघ की सभी शाखाओं और मुख्य विंग्स को रिजर्व बैंक के नियमों के तहत वैध बैंक खाते संचालित करने की अनुमति है। संगठन का 100% वित्तीय लेन-देन पूरी तरह से बैंकिंग प्रणाली (Banking Channels) के माध्यम से पारदर्शी रूप से होता है।

सुनील आंबेकर ने अंत में कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैधानिक स्थिति को लेकर देश की किसी भी अदालत या संवैधानिक संस्था में कोई कानूनी विवाद अस्तित्व में नहीं है। इस विषय पर कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा केवल अपने संकीर्ण राजनीतिक एजेंडे और चुनावी लाभ के लिए जनता के बीच भ्रम और दुष्प्रचार पैदा करने का असफल प्रयास किया जा रहा है।

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