नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में सोमवार (20 जुलाई 2026) को कई महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई हुई। शीर्ष अदालत ने एक तरफ जहां घर खरीदारों को धोखा देने वाले रियल एस्टेट बिल्डर को जेल भेजने की कड़ी चेतावनी दी, वहीं दूसरी तरफ जघन्य अपराधों के मामलों में सजा के सिद्धांत और देश के न्यायिक बुनियादी ढांचे को लेकर भी बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।
1. ‘पूरे देश को ठगा है, आदेश मानो या जेल जाओ’ – पार्श्वनाथ डेवलपर्स को सुप्रीम कोर्ट की अंतिम चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुग्राम के फ्लैट खरीदारों के पक्ष में जारी आदेशों का पालन न करने पर ‘पार्श्वनाथ डेवलपर्स’ और उसके निदेशकों को आड़े हाथों लिया। अदालत ने कंपनी को $12\%$ वार्षिक ब्याज के साथ पूरी बकाया राशि एक सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करने का अंतिम अवसर दिया है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने कहा:
“इन्होंने पूरे देश को ठगा है। ये पूरी व्यवस्था का मजाक बना रहे हैं। अगर आप एक सप्ताह के भीतर आदेश का पालन नहीं करते हैं, तो आपको जेल भेज दिया जाएगा। यूनिटेक के निदेशकों के साथ जो हुआ था, वही पार्श्वनाथ डेवलपर्स के साथ भी होगा।”
यह मामला कैंसर से उबर चुकीं रीटा टिक्कू और लोकेश टिक्कू से जुड़ा है, जिन्होंने गुरुग्राम के सेक्टर-53 स्थित ‘पार्श्वनाथ एक्सोटिका’ प्रोजेक्ट में अपनी जीवनभर की कमाई लगा दी थी। कोर्ट ने कहा कि गैर-जमानती वारंट जारी करने से पहले यह आखिरी मौका है। मामले की अगली सुनवाई अगले सोमवार को होगी।
2. सुधार की संभावना के आधार पर सामूहिक दुष्कर्म के दोषी की सजा घटाकर 20 वर्ष की
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2016 के एक सामूहिक दुष्कर्म मामले में प्राकृतिक जीवन के शेष हिस्से (उम्रकैद) की सजा काट रहे एक दोषी की सजा को घटाकर 20 वर्ष कर दिया। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह फैसला दोषी की कम उम्र और जेल में उसके अच्छे आचरण को देखते हुए लिया।
- अदालत का तर्क: अपराध के समय दोषी की उम्र केवल 25 वर्ष थी और उसका कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं है। रिमिशन (सजा माफी) सहित लगभग 10 वर्षों के दौरान जेल में उसका आचरण अच्छा रहा है, जिससे उसके सुधरने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
- सजा का सिद्धांत: पीठ ने पूर्व न्यायमूर्ति के. रामास्वामी की टिप्पणी का उल्लेख करते हुए कहा, “सजा तय करने की प्रक्रिया में जहां सख्ती जरूरी हो, वहां सख्त रहें और जहां दया की गुंजाइश हो, वहां दया भी बरती जानी चाहिए।”
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पितृसत्तात्मक सोच के कारण समाज में हो रहे ऐसे जघन्य अपराधों को किसी भी सूरत में कम नहीं आंका जा सकता।
3. विशेष NIA अदालतों की कमी पर चिंता, बुनियादी ढांचे को बताया अपर्याप्त
सुप्रीम कोर्ट ने देश में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज गंभीर मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की स्थापना में देरी पर कड़ी नाराजगी जताई।
‘इन रे: विशेष अदालतों की स्थापना’ शीर्षक वाले स्वतः संज्ञान मामले पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि कई राज्यों ने इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं। आधिकारिक दावों के विपरीत जमीन पर न्यायिक ढांचा संतोषजनक नहीं है।
- अपर्याप्त संख्या: कोर्ट ने उदाहरण देते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में केवल एक विशेष अदालत होना लंबित मामलों के निपटारे के लिए बेहद नाकाफी है।
- केंद्र सरकार का पक्ष: केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि अब तक 14 विशेष एनआईए अदालतें स्थापित की जा चुकी हैं (जैसे झारखंड में 7, गुजरात में 3 और जम्मू-कश्मीर, बिहार, छत्तीसगढ़, मणिपुर, असम व मिजोरम में 1-1 अदालत)।
हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि केवल कागजों पर अदालतों को नामित कर देना ही काफी नहीं है, बल्कि लंबित मामलों को समाप्त करने के लिए व्यावहारिक कदम उठाने होंगे ताकि आरोपियों और पीड़ितों दोनों के अधिकारों की रक्षा हो सके।

