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‘फिर से कोशिश करनी चाहिए’, वाजपेयी की भारत-पाकिस्तान शांति पहल को याद कर बोले पंजाब विधानसभा अध्यक्ष

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पंजाब विधानसभा अध्यक्ष मलिक अहमद खान ने पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की बस यात्रा के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि ‘हालांकि मौका चूक गया था, मगर हमें फिर से कोशिश करनी चाहिए।’ बता दें, यह यात्रा भारत-पाकिस्तान रिश्तों को शांति की दिशा में लाने की एक साहसिक कोशिश थी। इस यात्रा के 24 साल हो गए हैं।

वाजपेयी ने 19 फरवरी 1999 को लाहौर के लिए बस यात्रा की थी। यहां उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ ऐतिहासिक लाहौर घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता एक महत्वपूर्ण मोड़ था, लेकिन कुछ महीनों बाद पाकिस्तान की घुसपैठ के कारण कारगिल युद्ध हुआ।

हमें फिर से कोशिश करनी चाहिए: अहमद खान
बुधवार को वाजपेयी की 100वीं जयंती है। इससे पहले पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) के वरिष्ठ सदस्य मलिक अहमद खान ने कहा कि वाजपेयी की लाहौर यात्रा 1999 में एक महत्वपूर्ण क्षण थी। भले ही वह मौका चूक गया, हमें फिर से कोशिश करनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो वाजपेयी के दृष्टिकोण का पालन करते हैं और पाकिस्तान में नवाज के भाई शाहबाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने के बाद शांति प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का वास्तविक मौका है।’

खान ने कहा कि भविष्य मुक्त व्यापार और दोनों देशों के बीच बिना रोक-टोक के आावागमन पर निर्भर है। उन्होंने आगे कहा कि क्षेत्र में शांति सिर्फ एक अच्छा विचार नहीं, बल्कि विकास और समृद्धि के लिए आवश्यक है।

वाजपेयी के भाषण ने जगाई थी उम्मीद
पंजाब के एक और वरिष्ठ पीएमएल-एन नेता मोहम्मद मेहदी ने वाजपेयी की लाहौर यात्रा को ऐतिहासिक बताया और कहा कि यदि कारगिल संघर्ष नहीं हुआ होता, तो यह यात्रा स्थायी शांति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती थी। उन्होंने कहा कि पश्चिमी मीडिया ने वाजपेयी की यात्रा पर बहुत ध्यान दिया, क्योंकि यह दोनों देशों द्वारा 1998 में परमाणु परीक्षणों के बाद हुआ था। खासकर पीएमएल-एन के भीतर इस यात्रा को लेकर बहुत उत्साह था। वाजपेयी के भाषण ने उम्मीदें जगाई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘पाकिस्तान एक वास्तविकता है और दोनों देशों को अब आगे बढ़कर अतीत को पीछे छोड़ना चाहिए।’ हालांकि, कारगिल संघर्ष के बाद शांति प्रयास सफल नहीं हो सके। 

बस यात्रा का जेआई ने किया था विरोध
उन्होंने बताया कि वाजपेयी की यात्रा के दौरान जमात-ए-इस्लामी (JI) ने विरोध प्रदर्शन किए थे, जिन्हें कई लोग जनरल परवेज मुशर्रफ के नेतृत्व वाली सेना द्वारा संगठित मानते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान और भारत के बीच वार्ता अब भी जारी है। उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान में, दोनों देशों के रिश्ते सबसे निचले स्तर पर हैं। दोनों देशों के बीच कोई उच्चायुक्त नहीं है, लेकिन दोनों देशों के व्यापारी संबंधों को फिर से बहाल करने के लिए बेताब हैं। 

राजनीतिक विशेषज्ञ ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) फारूक हमीद का मानना है कि नवाज शरीफ को शांति प्रक्रिया में पाकिस्तान सेना को शामिल करना चाहिए था, तभी शायद यह पहल सफल हो पाती। उन्होंने कहा, ‘यह पहल इसलिए विफल हुई क्योंकि सेना को विश्वास में नहीं लिया गया था, जिससे कारगिल संघर्ष हुआ और शांति प्रक्रिया समाप्त हो गई। अगर नवाज शरीफ ने वाजपेयी की यात्रा से पहले सेना को भरोसे में लिया होता, तो शांति वार्ता सफल हो सकती थी।’

दोनों देशों के बीच बड़ी बाधा आतंकवाद
हमीद ने यह भी कहा कि आतंकवाद आज भी दोनों देशों के बीच सुलह के रास्ते में एक बड़ी बाधा बना हुआ है। भारत अक्सर पाकिस्तान पर आतंकवाद का समर्थन करने का आरोप लगाता है, जबकि पाकिस्तान अब भारत पर बलूचिस्तान में आतंकवादी हमलों का आरोप लगा रहा है।

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