नई दिल्ली: भारतीय आपराधिक इतिहास के सबसे काले पन्नों में दर्ज 12 मार्च 1993 के मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और सनसनीखेज विधिक व ऐतिहासिक खुलासा सामने आया है। उत्तर प्रदेश कैडर के पूर्व वरिष्ठ आईपीएस (IPS) अधिकारी राजेश पांडेय ने अपनी नई विधिक-अपराध विधा की पुस्तक ‘अंतहीन’ में इस वैश्विक आतंकी साजिश, इसके वित्तीय स्रोतों (Funding), पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI तथा डी-कंपनी (D-Company) के आंतरिक विखंडन की पूरी इनसाइड स्टोरी को उजागर किया है।
लेखक राजेश पांडेय के अनुसार, ये तमाम विधिक और खुफिया सामग्रियां उन्हें तब हासिल हुईं जब वे बरेली रेंज के आईजी (IG) के पद पर तैनात थे और उन्होंने बरेली जिला जेल में बंद रहे कुख्यात अंडरवर्ल्ड डॉन बबलू श्रीवास्तव से कई दौर की लंबी विधिक व रणनीतिक बातचीत की थी।
1. बहरीन की गुप्त बैठक और ₹250 करोड़ का ‘ऑपरेशन फंड’
पुस्तक के विधिक विवरण के अनुसार, 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी ढांचा ढहाए जाने के बाद मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों का फायदा उठाकर बदले की कार्रवाई की विधिक व आतंकी साजिश रची गई:
- खाड़ी देशों का सिंडिकेट: दंगों के बाद वित्तीय रसद जुटाने के लिए बहरीन में अंडरवर्ल्ड और खाड़ी देशों के रसूखदार सोने व जहाजरानी कारोबारियों की एक अत्यंत गोपनीय विधिक बैठक हुई।
- फंड जुटाने वाले मुख्य नाम: इसमें मुंबई और दुबई के बड़े विधिक व अवैध कारोबारी शामिल हुए, जिनमें मुख्य रूप से हाजी अहमद (सोना कारोबारी), मोहम्मद डोसा, मुस्तफा डोसा (जहाजरानी), जीकर भाई (स्मैक तस्कर) और फिरोज मर्चेंट शामिल थे। इनके अलावा हाजी कसाई, हाजी अशरफ, छोटा शकील, अनीस इब्राहिम और टाइगर मेमन ने मिलकर कुल ₹250 करोड़ का भारी-भरकम फंड एकत्र किया।
2. आईएसआई (ISI) की एंट्री और दाऊद को कमान
ISI और डी-कंपनी का विधिक-आतंकी गठजोड़⎩⎨
⎧कमान सौंपना:वित्तीय गारंटी:लॉजिस्टिक्स व हथियार:बहरीन बैठक की भनक लगते ही ISI ने दाऊद इब्राहिम के मजबूत नेटवर्क को देखते हुए उसे पूरे ऑपरेशन का विधिक कमांडर बनाया।ISI ने आश्वस्त किया कि चंदे के अलावा होने वाला सारा अतिरिक्त वित्तीय खर्च पाकिस्तान सरकार वहन करेगी।विस्फोटक (RDX) और AK-47 राइफलें ISI ने उपलब्ध कराईं, जिन्हें दाऊद ने छोटा शकील के जरिए मुंबई भिजवाया।
3. धमाकों के वक्त दुबई के गेस्ट हाउस में ‘लाइव’ देख रहा था दाऊद
बबलू श्रीवास्तव के विधिक कबूलनामे के अनुसार, 12 मार्च 1993 (शुक्रवार) को जब मुंबई दहल रही थी, तब दाऊद इब्राहिम, छोटा शकील और उसके गुर्गे दुबई के डेरा इलाके में शरद शेट्टी उर्फ अन्ना के ‘मॉडर्न’ गेस्ट हाउस में बैठकर टीवी पर लाइव तबाही देख रहे थे।
जैसे ही टीवी चैनलों पर दाऊद का नाम मास्टरमाइंड के रूप में आया, तो गैंग के हिंदू सदस्य (छोटा राजन, अनिल परब, अनिल कोठारी, अनिल लंबू) सन्न रह गए। छोटा राजन ने जब सीधे दाऊद से पूछा, “तुमने ही तो ये नहीं कराया है?” तो दाऊद ने विधिक चालाकी दिखाते हुए झूठ बोला कि इसमें उसका हाथ नहीं है और सारा ठीकरा टाइगर मेमन पर फोड़ दिया।
4. ‘नो गैर-मुस्लिम’ नीति: ऐसे हुआ छोटा राजन और दाऊद का विखंडन
ब्लास्ट के बाद जब मुंबई पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए दाऊद गैंग की विस्तृत विधिक प्रोफाइलिंग शुरू की, तो भारत सरकार के राजनयिक दबाव को देखकर आईएसआई घबरा गई।
- पाकिस्तान भागने का फरमान: आईएसआई ने दाऊद को तुरंत दुबई छोड़कर सुरक्षित ठिकाने (पाकिस्तान) आने का विधिक निर्देश दिया।
- विशिष्ट सांप्रदायिक निर्देश: आईएसआई ने कड़ा विधिक निर्देश दिया था कि “किसी भी गैर-मुस्लिम को साथ लेकर पाकिस्तान न आएं।”
- छोटा राजन को धोखा: जब मॉडर्न गेस्ट हाउस में छोटा राजन ने दाऊद से कहा कि वह भी उसके साथ पाकिस्तान जाना चाहता है और दूतावास से उसके विधिक पासपोर्ट का इंतजाम करा दे, तो दाऊद ने उसे साफ मना कर दिया और कहा कि तुम्हारी वहां जरूरत नहीं है।
अगली सुबह दाऊद और शकील पाकिस्तान फरार हो गए। इस घटना के बाद छोटा राजन ने अपने गुर्गों के साथ गुप्त बैठक की और कहा— “हो न हो मुंबई ब्लास्ट दाऊद ने ही कराया है, वरना वह कभी पाकिस्तान नहीं भागता।” दाऊद द्वारा दिए गए इसी विधिक व रणनीतिक धोखे और सांप्रदायिक भेदभाव के कारण डी-कंपनी दो फाड़ हो गई और छोटा राजन ने अपना अलग गैंग बना लिया। यह पुस्तक उस दौर के पुलिस-अंडरवर्ल्ड गठजोड़ और तत्कालीन विधिक जांच के कई अनछुए पहलुओं को उजागर करती है।

