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Friday, May 22, 2026

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देश में 47 हजार बच्चे गुमशुदा: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, गायब होते ही तुरंत दर्ज होगी FIR

नई दिल्ली: देश में बच्चों की गुमशुदगी के बढ़ते आंकड़ों पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को देश में 47,000 बच्चों के लापता होने की भयावह स्थिति पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि लापता होने वाले बच्चे अक्सर संगठित अंतरराज्यीय तस्करी गिरोहों (Organized Interstate Trafficking Gangs) के चंगुल में फंस जाते हैं।

अदालत ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए देशभर के पुलिस प्रशासन और केंद्र सरकार के लिए कई ऐतिहासिक और अनिवार्य दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह आदेश जी. गणेश नामक व्यक्ति द्वारा मद्रास हाईकोर्ट में दायर याचिका के संदर्भ में आया है, जिनकी बेटी 19 सितंबर, 2011 को चेन्नई से लापता हो गई थी।

केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) को क्या निर्देश दिए?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को एक व्यापक डिजिटल नेटवर्क तैयार करने का आदेश दिया है:

  • एकल प्लेटफॉर्म नेटवर्क: गृह मंत्रालय देश के प्रत्येक पुलिस थाने को एक ही प्लेटफॉर्म से जोड़ने वाला एक सेंट्रलाइज्ड नेटवर्क तैयार करेगा।
  • विशेष पोर्टल: इस नेटवर्क के अंतर्गत लापता बच्चों, महिलाओं और मानव तस्करी (Human Trafficking) से जुड़े मामलों की ट्रैकिंग के लिए एक विशेष समर्पित पोर्टल बनाया जाएगा।
  • एंटी-ट्रैफिकिंग यूनिट्स: कोर्ट ने आदेश दिया कि देश की सभी मानव तस्करी विरोधी इकाइयों (Anti-Human Trafficking Units) को चार हफ्तों के भीतर पूरी तरह सक्रिय किया जाए।

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थानों के लिए जारी सख्त गाइडलाइंस (FIR और जांच के नियम)

अदालत ने पुलिस थानों की कार्यप्रणाली में ढिलाई को रोकने के लिए निम्नलिखित अनिवार्य नियम तय किए हैं:

1.तुरंत प्राथमिकी (FIR) दर्ज करना:बिना किसी प्रारंभिक जांच के.

किसी भी व्यक्ति या बच्चे के लापता होने की सूचना मिलते ही संबंधित थाने को बिना किसी प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) के या अभिभावकों की प्रतीक्षा किए बिना तुरंत FIR दर्ज करनी होगी।

2.अपहरण और तस्करी की धाराएं जोड़ना:BNS के तहत अनिवार्य प्रावधान.

लापता होने की उस प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत अपहरण (Kidnapping) और मानव तस्करी संबंधी गंभीर दंडात्मक धाराओं को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा।

3.गंभीरता से जांच की शुरुआत:शुरुआत से ही अगवा होने की आशंका.

पुलिस को केस दर्ज करते ही यह मानकर कार्रवाई शुरू करनी होगी कि बच्चे का अपहरण हुआ है। अपहरण की धाराओं के तहत मामला दर्ज होने से जांच में ढिलाई की गुंजाइश खत्म होगी।

4.24 घंटे के भीतर पुनर्वास:परिवार को सौंपने की समय-सीमा.

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बरामद या रेस्क्यू किए गए बच्चों को 24 घंटों के भीतर उनके परिवारों को सौंपना होगा। हालांकि, यदि यह संकेत मिले कि परिवार खुद बच्चे के शोषण या तस्करी में शामिल था, तो यह नियम लागू नहीं होगा।

पहचान सुनिश्चित करने के लिए बायोमेट्रिक सत्यापन का आदेश

शीर्ष अदालत ने बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्थायी पहचान सुनिश्चित करने के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण सुरक्षात्मक कदम उठाने को कहा है:

बायोमेट्रिक एकीकरण: किसी भी लापता बच्चे को सुरक्षित छुड़ाए जाने या बरामद होने के तुरंत बाद, उसे अनिवार्य रूप से पहचान सत्यापन या नया सरकारी पहचान पत्र बनवाने की प्रक्रिया के लिए ले जाया जाना चाहिए। चूंकि इस प्रक्रिया में बच्चे के उंगलियों के निशान (फिंगरप्रिंट्स) और अन्य बायोमेट्रिक्स दर्ज किए जाते हैं, इसलिए यह तकनीक भविष्य में बच्चों की दोबारा तस्करी रोकने और उनके नागरिक रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने में सबसे मजबूत हथियार साबित होगी।

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