नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने जल बंटवारे को लेकर तनाव और बढ़ गया है। सरकारी सूत्रों ने सोमवार (20 जुलाई 2026) को स्पष्ट कर दिया है कि ऐतिहासिक सिंधु जल संधि (IWT) अपने मौजूदा स्वरूप में दोबारा लागू नहीं होगी। भारत ने साफ किया है कि संधि के तहत किसी भी प्रकार का सहयोग बहाल करने के लिए पाकिस्तान को सबसे पहले सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह और स्थायी रूप से समाप्त करना होगा।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ और संधि को स्थगित करने की पृष्ठभूमि
पिछले वर्ष अप्रैल में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए एक भीषण आतंकी हमले में 26 नागरिकों की मौत हो गई थी। भारतीय खुफिया एजेंसियों के अनुसार, इस हमले के पीछे पाकिस्तान समर्थित लश्कर-ए-तैयबा के सहयोगी संगठन ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (TRF) का हाथ था।
- भारत का कड़ा एक्शन: इस कायरतापूर्ण हमले के जवाब में भारत सरकार ने कूटनीतिक और आर्थिक कदम उठाते हुए सिंधु जल संधि को स्थगित कर दिया था।
- सैन्य कार्रवाई: इसके तुरंत बाद मई में भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाकर पाकिस्तान में स्थित आतंकी बुनियादी ढांचे को तबाह किया था।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि यदि भविष्य में इस संधि को फिर से प्रभावी बनाना है, तो इसके लिए एक नए ढांचे (New Framework) के तहत बातचीत करनी होगी, जो केवल आतंकवाद-मुक्त माहौल में ही संभव है।
पानी की कमी का पाकिस्तानी नैरेटिव पूरी तरह गलत
सूत्रों ने पाकिस्तान के उस दुष्प्रचार को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें दावा किया जा रहा है कि भारत द्वारा संधि स्थगित किए जाने से पाकिस्तान में पानी का संकट पैदा हो गया है।
वास्तविकता: पाकिस्तान को मिलने वाले पानी का एक बहुत बड़ा हिस्सा खुद उसकी खराब प्रबंधन व्यवस्था के कारण बर्बाद हो जाता है। पर्याप्त जल भंडारण (डैम) न होना, नहरों में भारी रिसाव और पाकिस्तान के विभिन्न प्रांतों के बीच जल बंटवारे के आंतरिक विवाद इसके असली कारण हैं।
सूत्रों ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत फिलहाल इस संधि से पूरी तरह अलग होने की दिशा में सक्रिय विचार नहीं कर रहा है, लेकिन एक संप्रभु राष्ट्र होने के नाते उसके पास अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए किसी भी संधि को समाप्त करने का पूर्ण अधिकार सुरक्षित है।
पाकिस्तान के अड़ियल रवैये और भड़काऊ बयानबाजी ने बिगाड़ी बात
भारत का आरोप है कि पाकिस्तान ने हमेशा इस संधि का उपयोग सहयोग के बजाय भारत की वैध विकास परियोजनाओं को बाधित करने के लिए किया है:
- हर परियोजना का विरोध: पाकिस्तान ने सलाल, तुलबुल, बगलिहार, किशनगंगा और रतले जैसी बड़ी परियोजनाओं के साथ-साथ सुदूर आदिवासी इलाकों के लिए बनी 200 किलोवाट की छोटी पनबिजली परियोजनाओं पर भी तकनीकी अड़ंगे लगाए।
- समानांतर कानूनी कार्यवाही: वर्ष 2015-16 में किशनगंगा और रतले परियोजनाओं पर विवाद के दौरान पाकिस्तान ने संधि के नियमों का उल्लंघन करते हुए ‘तटस्थ विशेषज्ञ’ और ‘मध्यस्थता न्यायालय’ (Court of Arbitration) दोनों के समक्ष एक साथ समानांतर कार्यवाही की मांग की, जिसे भारत ने खारिज कर दिया।
- परमाणु युद्ध की धमकी: हाल के महीनों में पाकिस्तान के राजनेताओं और सैन्य नेतृत्व ने भारत के खिलाफ भड़काऊ बयानबाजी तेज कर दी है, जिसमें परमाणु हथियारों के इस्तेमाल और पानी रोके जाने पर युद्ध शुरू करने जैसी धमकियां शामिल हैं।
जमीन पर आतंकवाद कम होने के कोई सबूत नहीं
भारतीय एजेंसियों के पास उपलब्ध इनपुट के अनुसार, नियंत्रण रेखा (LoC) के पार आतंकवादी गतिविधियां बदस्तूर जारी हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की 1267 प्रतिबंध समिति द्वारा घोषित वैश्विक आतंकवादी और प्रतिबंधित संगठन आज भी पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे हैं, रैलियां कर रहे हैं और सार्वजनिक मंचों से भारत विरोधी संदेश फैला रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत किसी भी तरह की द्विपक्षीय रियायत देने के मूड में नहीं है।
क्या है सिंधु जल समझौता (1960)?
विश्व बैंक की मध्यस्थता में 19 सितंबर 1960 को नौ साल की लंबी बातचीत के बाद इस संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके तहत नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया था:
- पूर्वी नदियां (भारत का अधिकार): रावी, ब्यास और सतलुज।
- पश्चिमी नदियां (पाकिस्तान का अधिकार): सिंधु, झेलम और चिनाब (भारत को इन पर सीमित उपयोग और रन-ऑफ-द-रिवर पनबिजली परियोजनाएं बनाने का अधिकार है)।

